भाग 1 —पारिजात के फूल —-विजय कुमार सप्पत्ती, तेलंगाना

vijay 2वह सर्दियों के दिन थे.मैं अपनी फैक्टरी सेनाईटशिफ्ट करके बाहर निकला और पार्किंग से अपनी साइकिलउठाकरघर कीओरचल पड़ा. सुबह के 8:00 बज रहे थे.मैंअपने घर के सामने से गुजरा.मां दरवाजे पर खड़ी थी, मैंने मां को बोला‘मां नहानेका पानी गरम कर दे और पुड़ी सब्जी बना दे. बहुत भूख लगी है. मैं अभी आता हूँ ‘मां मुस्कराई,वोजानती थी किमैं कहां जा रहा हूं

मैं थोड़ी दूरऔर गया. पारिजात का घर आया, पारिजात अपने आँगन के दरवाजे पर खड़ी थी.मैं सायकिल से उतर कर उससे बातें करने लगा.पारिजात ने कहा, ‘ आज आप लेट हो गए‘मैंने कहा ‘आज काम ज्यादा था. नया-नया काम मिला हुआ है ऑपरेटर हूं. एक के बाद एक कोई ना कोई काम दे देता है. परकोई नहीं तुम्हें देखकर सारी थकान मिट जाती है.‘ पारिजात मुस्करा कर बोली ‘हां मैं जानती हूं न इसलिए तो मैं यहां खड़ी थी, अच्छा रुको मैं तुम्हारे फूल लेकर आती हूँ.‘मैंने कहा ‘सिर्फ इन फूलो के लिए ही तो मैं सर्दियों में नाईटशिफ्ट करता हु, वरना कौन इतनी कड़क सर्दी में काम करें. पर तुम और तुम्हारे पारिजात के फूलों के लिए सब कुछ कबूल है.‘वहअपने घर केभीतर गयी और एक कटोरी में फूल लेकर आई. साथ में उसकीमाँ भी थी. मैंने उन्हें प्रणाम किया, पारिजात ने वह कटोरी मेरे खाने के डब्बे कीथैली के ऊपर रख दी. और धीरे से कहा, ‘ ये फूल मेरे देवता के लिए है, तुम्हारे लिए !‘ मैंने मुस्करा कर कहा, ‘हां न, मैं तुम्हारा देवता और तुम मेरी देवी.घरआ जाओ, मिलकर खाना खाते है.‘ उसने कहा, ‘आतीहूँ. ‘ फिर मुड़कर अपनी माँ से कहा, ‘ माँ, आज चाची पूरी सब्जी बना रही है, हरी मुझे बुला रहे है मैंजाऊं. ‘उसकी माँ ने मुस्कराकर हामी भर दी.पारिजात नेमुझसे कहा‘तुम जाओ मैं आती हूँ. ‘

मैंने अपनी साइकिल उठाई और घर की और वापस चल पड़ारास्ते में देखा कि कन्हैया अपने घर के आगे खड़े हो कर कबूतरों और मुर्गियों को दाना दे रहा था. मुझे देखा तो कहा ‘ वाह भैया मिल आये ससुराल से, ‘ वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त था. मैं ने कहा ‘घर आ जा, माँपूड़ी सब्जी बना रही है. मिलकर खाते है. पारिजातभी आ रही है. ‘ वो बोला, ‘ चाची के हाथ कीसब्जी, अभी आता हूँ, तू जा और तैयार हो जा.‘

मैं घर पहुंचा, और माँ से कहा‘माँ पारिजात और कन्हैया भी आ रहे है. उनके लिए भी बना ले. ‘ माँ ने कहा, ‘ मैं जानती हूँरे हरी, तू उन्हें जरूरबुलायेगा, और फिर कन्हैया को तो मेरे हाथोंकीसब्जी बहुत पसंद है, तेरागरम पानी रख दिया है,नहा ले. ‘

मैंबाथरूमकीऔरचल पड़ा, रास्ते में मेरी बहन छुटकीआ गयी और नटखट स्वर में बोली, ‘ क्यों भैया मिल आये भाभी से ‘मैंने उसके तरफ नकली गुस्से में देखा और कहा‘चल भाग यहाँ से शैतान‘

नहाने के बाद पूजाघर गया, वह पर कटोरी में पारिजात के फूल रखे थे.जरूरछुटकी ने रखे होंगे, मैंने मुस्करा कर सोचा और पूजा किया.

मैं सोचने लगा, यहाँ सभी मेरे और पारिजात के प्रेम के बारे में जानते है, मेरे घर में भी और उसके घर में भी. और मोहल्ले वाले भी, कभीकिसी ने कोई बात नहीं कही, आज एक साल से ऊपर हो रहा था, सभी ने हमें और हमारे पवित्र प्रेम को स्वीकार कर लिया था.

इतने में आवाज़ आई, ‘ क्यों भाई, हमें तो कभी पूड़ी सब्जी के लिए नहीं बुलाते हो ‘ ये पारिजात के भाई शिव कीथी, मैंने कहा‘यारतुम्हारा ही घर है, आ जाया करो, जब भी जी चाहे. ‘
मैंने देखा कि साथ में पारिजात और कन्हैया भी थे.

हम सब किचन में पालथी मारकर पंगतमेंबैठ गए. मैं,छुटकी, पारिजात, शिव और कन्हैया !
माँ ने आलू कीसब्जी पहले ही बना ली थी और गरमा-गरम पूरियां तल रही थी, सबसे पहले उन्होंने, पारिजात को परोसा, फिर कन्हैया को, फिरछुटकी को, फिर शिव को और अंत में मुझे.बसपूरियां बनती गयी और हम सब खाते गए, कन्हैया सबसे ज्यादा खा गया और फिर शिव से कहा‘यार शिव, जल्दी से इन दोनों कीशादी करवा दो, हम बारात लेकर आना चाहते है, तुम्हारे घर में शादी कीपंगत में बैठेंगे. ‘ शिवने मुस्कराकर कहा,‘बस एक साल और, पारिजात का MAकी पढाई हो जाए, फिर इन दोनों को इस शादी के बंधन में बाँध देते है, ‘ मैंने मुस्कराकर कहा‘हां तब तक मेरी नौकरी भी पक्की हो जायेंगी. क्यों पारिजात तुम क्या कहती हो. ‘ पारिजात शर्मा गयी थी. उसने कुछ नहीं कहा, बस इतना ही कहा,‘जैसे भैया कहेंगे!‘ इतने में छुटकी ने चुटकी ली,‘मन में तो लड्डू फूट रहे है भाभी के. ‘ पारिजात ने कहा ‘ अरे हां, तुम शाम को ड्यूटी पर जाते हुए घर आ जाना, कल तुम्हारा जन्मदिन है तो माँ बूंदी के लड्डू बना रही हैतुम कुछ लेते जाना अपने डब्बे में ‘ कन्हैयाने कहा, ‘भाई हम भी आयेंगे, हमें भी पसंद है बूंदी के लड्डू.‘ पारिजात ने कहा, ‘हां न तो आ जाना, कौन मनाकर रहा है, तुम्हारा भोगतो हरी से भी पहले लगताहै, ‘ हम सब हंस पड़े. यही हमारी आत्मीयता थी, यही प्यार था. यही स्नेह था. यही मेरी और पारिजात की जोड़ी थी !

सब अपने-अपने घर चले गए, मैं बिस्तर पर लेट गया और पारिजात के बारे में सोचने लगा —–

विजय कुमार सप्पत्ती
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