साजिशों की महफ़िल में बेबकूफो की कमी–शैलेश कुमार

सवाल ये नहीं की ताजमहल किस सम्प्रदाय से है, सवाल है की अब ताजमहल की देशहित में देन क्या है।

सवाल -इतिहास क्या था ये नहीं सवाल है वर्तमान में क्या है और उसका निदान क्या है ?
सवाल ये नहीं की वर्तमान के मुस्लिम -हिन्दू थे , सवाल है वर्तमान में वे क्या है ?

सवाल ये नहीं की शाहजहां कौन था सवाल ये है की वर्तमान में वह किस धर्म से है ?

सवाल ये नहीं की राजपूत हूँ और राजपूती खून है सवाल है की वर्तमान में क्या है ?

सवाल ये नहीं की मैं ब्राह्मण हूँ इतिहास मेरी है सवाल है की वर्तमान में आप की कीर्ति किया है ?

साजिशों से देश नहीं चलता है , साजिश से बर्वादी ही होती है।

धर्म सामाजिक समता के लिए जहर है जिसका मार्ग जाति हैं .

हमें समग्र समता के लिए समाज में व्याप्त हर बंधन को तोड़ना होगा।

जैसे -हम जाट है,हम ब्राह्मण है , हम राजपूत है और चमार हमसे नीच है तो फिर अपने अपने शौचालय को खुद क्यों नहीं साफ़ करते है। विबाह में डम्फा -डम्फी खुद क्यों नहीं पीटते है।

इतिहास यही है की राजपूत , ब्राह्म्णों और वैश्य का काम कलम-कागजात का नहीं है ,

कलम पकड़ना धार्मिक अपराध है तो फिर इसे कायस्थों का जीवन -यापन का मार्ग में बाधा क्यों डाल रहे है ?

अगर धर्म और इतिहास देखे तो वर्तमान में कायस्थों को ही सभी प्रशासनिक कार्य से लेकर न्यायिक क्षेत्र में होना चाहिए।

पंचायत सचिव से लेकर सुप्रीम कोर्ट के महामहिम सिर्फ कायस्थ ही होना क्यों नहीं चाहिए ??
सब जानते है की संविधान द्वेषयुक्त है,संविधान सभी विवादों का जड़ है,फिर भी संविधान की शपथ खाते है,हम इसी के अनुसार काम करेंगे।

अगर हम गलत चीजों की सुरक्षा का शपथ खायेगें तो फिर हम सही क्या करेगें—

सुधारक कौन होता है ? राजा राम मोहन राय अगर अंग्रेजों और पूर्व व्यवस्थाओं कि रक्षा का शपथ खाते तो क्या वे वर्तमान भारत के निर्माता कहे जाते ?

हमें देखना होगा कि वर्तमान में परंपरागत व्यवस्था मे त्रुटि क्या है, उस त्रुटियों को सुधार करने के लिये किया गया प्रयास ही सुधारक कहलाता है ?

ह्म भारत ऐक्य कि गाथा गाते हैं लेकिन हिंसात्मक मानसिकता के कारण जीवन-यापन के लिये एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करने वाले हिंसा के शिकार होते है. महाराष्ट्रा और जम्मू -कश्मीर तो स्वर्ण पदक विजेता है.

अगर हम यथावत स्थिति ही कायम रखने कि शपथ खाते है तो फिर कन्फ्युशिश कि तरह पूर्व ही क्यों न लौट चले.

अगर मंदिरों में सिर्फ पूजा करने के लिये दलित जातियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है तो मंदिरों को क्यों नही समाप्त कर देना चाहिये.

पूर्व कि ओर लौट चले—वैदिक काल मे कौन से संगमरमर और सोने तथा हीरे से जटित मंदिर था और कौन से देवी -देवा सोने और हीरे की हार पहनते थे .

अर्थात —————–साजिशों की महफ़िल में बेबकूफो की कमी