चर्च के रूढ़िवाद पर प्रहार कौन करेगा ?

दिल्ली —(आर एल फ्रांसिस)———–पी बी लाेमियाें ने चर्च के साम्राज्यवाद का जिक्र जिस तरीके से किया, वह देश भक्त भारतवासियों की आँखें खोल देने वाला है। चर्च नेतृत्व एवं विदेशी मिशनरियों द्वारा भारत में धर्मांतरण के लिए अपनाई जाने वाली घातक नीतियों और चर्च के राष्ट्रीय – अतंरराष्ट्रीय नेटवर्क को भारतीय समाज के लिए घातक करार दिया।

पी बी लाेमियाें का जीवन नई पीढ़ी के लिए एक पथ प्रदर्शक का कार्य करता रहेगा। ईश्वर कुछ चुनिंदा लोगों को ही ऐसे कार्य के लिए चुनता है, जो समाज को नई दिशा व दशा से आलोकित करते हैं।
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इस महीने की आठ तारीख को ईसाई विचारक, लेखक, आलोचक और पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के वरिष्ठ सहयाेगी पी बी लाेमियाें का निधन हो गया। लाेमियाें ने चर्च के रूढ़िवाद पर प्रहार करते हुए बहुत सारे आलोचनात्मक लेख लिखे, जो अब स्मृति में रह जाएंगे।

2 दिसमबर 1995 काे दैनिक समाचार पत्रों में चर्च के रूढ़िवाद पर तीखा हमला करते हुए “मदर टेरेसा के आंसू” नाम से एक बड़ा लेख लिखकर चर्च के दोगलेपन काे भारतीय समाज के समाने लाने का साहस दिखाया कि किस तरह चर्च नेता अपनी शरण (ईसाइयत) में आए दलिताे काे अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं।

लाेमियाे की शिक्षा-दीक्षा मिशन में ही हुई, इस कारण उनके जीवन पर चर्च का गहरा प्रभाव पड़ा। अगर व्यक्ति वंचिताें की लड़ाई और उनके साथ न्याय को अपने जीवन का ध्येय बना ले, तो उसमें जनहित और समाज के लिए जीने का भाव कितना अधिक होगा। ये लाेमियाें के जीवन से सहज ही समझा जा सकता है। वे जब तक सक्रीय रहे, हमेशा ही शोषितों, वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे।

चर्च के रूढ़िवाद और भेदभाव के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई और दो पुस्तकों काे लिखा। चर्च के साम्राज्यवादी रैवये पर किए गए प्रहार से चर्च व्यवस्था में तहलका मच गया था।

उनकी पहली पुस्तक “बुधिया एक सत्य कथा” चर्च में दलित र्इसाइयों के शोषण का आर्इना है।

लोमियों द्वारा लिखित ‘ बुधिया’-एक सत्यकथा ’ धर्मांतरण को लेकर पादरियों की पोल खोलती है यह कोई काल्पनिक गल्प (कथा) नहीं है। अपितु सत्य के धरातल पर उकेरा गया, वह संदेश है, जो वर्तमान चर्च को एक सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाने का संकेत देता है। शर्त बस यही है, कि चर्च इसे, नकारात्मक दृष्टिकोण से न देख कर ठोस सकारात्मक सोच अपनाए।

धर्मांतरण और कैथोलिक चर्च की अधिनायकवादी सोच पर लिखा गया उतर भारत का यह पहला उपन्यास है। आज तक ब्राह्रामणवादी व्यवस्था में दलित और अछूत वर्गो को लेकर अनेकों उपन्यास और कहानियाँ लिखी गई है पर किसी भी उपन्यासकार ने चर्च के अंदर उत्पीड़त होते इन वर्गो पर लिखने और उनकी दयनीय दिशा का समाज से परिचय करवाने का प्रयास नही किया है।

यह लघु उपन्यास भारत के उन लाखों-करोड़ों धर्मांतरित ईसाइयों की व्यथा कथा भी है, जो चर्च के झूठे प्रलोभनों में फंस कर प्रगति और सामाजिक विकास तथा सम्मान की आशा लिये हुए, अपनी मूल जाति और हिन्दू धर्म को त्याग कर ईसाई बन गए थे, ईसाई बनने के बाद उनकी दिशा पहले से भी बदत्तर हुई है, और वह चर्च में पादरियों के गुलामों जैसा जीवन जी रहे है।

‘बुधिया’-एक सत्यकथा’ की नायक (बुधिया) एक पंडवानी की कलाकार है जो छतीसगढ़ से पंडवानी खेलते हुए पाकदिलपुर मिशन स्टेशन (उतर प्रदेश) में आते है और यही पर पादरियों की उन पर नजर पड़ती है और वह इन आत्माओं को बचाने के लिए अमेरिका से आने वाले तेल, दूध पाऊडर, दलिया, पनीर, बटर आॅयल, गेहूँ-चावल – इत्यादि के भंडार इनके लिए खोल देते है। यहीं से पंडवानी खेलने वाले इस परिवार का दुर्भाग्य शुरु हो जाता है। चर्च के पादरी जल्द ही इस परिवार को कैथोलिक में दीक्षित कर पोप के सच्चे अनुयायियों में शामिल कर पाकदिलपुर मिशन स्टेशन से जूडपुर-झांसी में लाकर बसा देते है।

जूडपुर, कैथोलिक ईसाई मिशनरियों का कृषि फार्म विलेज है। यह झाँसी से लगभग सात किलोमीटर दूर पूर्वोत्तर में स्थित है। यहां कैथोलिक पादरियों के खेतों में बंधुवा मजदूरी करते-करते पंडवानी कलाकारों का दुखःदायी अंत शुरु हो जाता है। उन्होंने चर्च के अंदर व्यप्त वर्ग भेद पर जमकर प्रहार किया आैर प्रशासनिक दांव-पेंच चलाते फादरों और ननों को भी नही बकशा है। बुधिया की यह सच्ची कहानी चर्च के अंदरुनी दांव-पेंचों और उसके धर्मांतरण के कारोबार का कच्चा-चिठ्ठा खोलती है।

अपनी दूसरी पुस्तक ‘‘ ऊँटेश्वरी माता का महंत” में ईसाई समाज के अंदर चर्च की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल उठाये। “ऊँटेश्वरी माता का महंत” र्शीषक से लिखी गई यह पुस्तक एक येसु समाजी (सोसाइटी ऑफ जीजस) कैथोलिक पादरी (फादर एंथोनी फर्नांडेज) जिन्होंने अपने जीवन के 38 वर्ष कैथोलिक चर्च की भेड़शलाओं का विस्तार करने में लगा दिए, चर्च की धर्मांतरण संबधी नीतियों का परत दर परत खुलासा करती है और साथ ही चर्च नेतृत्व का फरमान न मानने वाले पादरियों और ननों की दुर्दशा को बड़ी ही बेबाकी से उजागर किया।

कैथोलिक चर्च व्यवस्था, रोमन कूरिया, जेसुइट कूरिया पर कई स्वाल खड़े करते हुए ‘‘उतरी गुजरात” के कुछ हिस्सों में चर्च द्वारा अपनी भेड़शलाओं को बढ़ाने का चौंकाने वाला खुलासा किया कि ईसाइयत में शुरु से ही पूरी दुनियां को जितने का एक जानून रहा है और इसके इस कार्य में जिसने भी बाधा खड़ी करने की कौशिश की वह इस साम्राज्यवादी व्यवस्था से सामने ढेर हो गया।

भारत में भी पोप का साम्राज्यवाद उसी नीति का अनुसरण कर रहा है। अगर कोई पादरी या नन व्यवस्था के विरुद्व कोई टिप्पणी करते है तो उनका हाल भी फादर एंथोनी फर्नाडिज जैसा ही होता है क्योंकि चर्च व्यवस्था में मतभिन्नता के लिए कोई स्थान नहीं है।

लाेमियाें ने चर्च के साम्राज्यवाद का जिक्र जिस तरीके से किया, वह देश भक्त भारतवासियों की आँखें खोल देने वाला है कि भारत में वेटिकन की ’’समानान्तर सरकार” स्वतंत्रता से पूर्व 1945 में ही स्थापित हो गई थी (जब यहाँ कैथोलिक बिशप्स कान्फ्रेंस ऑफ इण्डिया, का गठन हो गया था तथा बाद में वेटिकन का राजदूत (इंटरनुनसियों) नियुक्त हो गया।

भारत सरकार और राज्य सरकारों तथा उच्चधिकारियों पर इसकी कितनी मजबूत पकड़ हैं – को भी आप स्पष्ट रूप से देख-समझ सकेंगे – समाज सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के खेल द्वारा यह समानान्तर सरकार जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को अपने पॉकिट में किस तरह और किस ठसक से रखती हैं, आप कल्पना ही नहीं कर सकते! इस कार्य में पांचवी सेना ’’मीडिया” भी अपना अहम रोल अदा करती हैं।

लाेमियाें ने धर्मांतरित ईसाइयों की दयनीय स्थिति और चर्च नेतृत्व एवं विदेशी मिशनरियों द्वारा भारत में धर्मांतरण के लिए अपनाई जाने वाली घातक नीतियों और चर्च के राष्ट्रीय – अतंरराष्ट्रीय नेटवर्क को भारतीय समाज के लिए घातक करार दिया। लाेमियाें का जीवन नई पीढ़ी के लिए एक पथ प्रदर्शक का कार्य करता रहेगा । ईश्वर कुछ चुनिंदा लोगों को ही ऐसे कार्य के लिए चुनता है, जो समाज को नई दिशा व दशा से आलोकित करते हैं। मेरा उनके साथ बिताया हर पल आज भी दृश्यमान होता है। पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट परिवार का उनकाे शत् शत् नमन।

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