हमारे देश की सरकार सिर्फ भैंस ढूंढवाने वाली है।

शायद सभी को पता है कि हमारे देश में भैंस ढूंढवाने वाले भी मुख्यमंत्री बने हैं और डीजीपी का सख्त आदेश होता है कि प्रदेश के सभी पुलिस तंत्र भैंस ढूंढने में लग जाओ।

बेचारे पुलिस !!

बेचारे पुलिस दर-दर भटकती है और आखिरकार भैंस ढूंढ ही लिया जाता है। लेकिन महा माफिया को जिला पुलिस कप्तान भव्य स्वागत करता है।

लेकिन इसी राज्य में एक हत्यारा को पकड़ने के लिए थाने में आए पीड़ित को रगड़ दिया जाता है।

रगड़ना भी चाहिए क्योंकि पुलिस उसी तंत्र के हिस्से हैं जिस तंत्र में अपराधी और माफिया को धूप दीप दिखाया जाता था।

आज देश में भी प्रधान लगभग इसी से मिले जुले काम में व्यस्त हैं।

प्रधान के पुलिसगण, प्रशासन तंत्र उसको ढूंढने में लगे रहते हैं की कौन, निकम्मी , गिरी हुई व्यवस्था का वीडियो बना कर हमारी सड़ीगली तंत्र का भंडाफोड़ कर रहा है। इसके लिए डिजिटल और सोशल मीडिया एक्ट का भी गठन किया गया । जिससे क्षेत्र के पीड़ितों का आवाज दादागिरी के साथ दबाये जा सके लेकिन दब नहीं रही है।

प्रधान लोगों के आंखों का किरकिरी बन गए हैं लेकिन उनके सहयोगियों का ऐसा मानना कि वे चाँद तारें बन गए है।

प्रधान तंत्र का दिली ख़्वाहिश है कि गाली बकने वाले, प्रश्न पूछने वाले , हमारी कमजोरी उजागर करने वाले क्षेत्र में नहीं सलाखों के अंदर हो।

विश्व का इतिहास पढ़ने वाले को याद होना चाहिए कि इस तरह की धारणा रखने वाले का अभ्युदय फ्रांस के राजतंत्र में हुआ था। इसी धारणा को टेररिज्म ऑफ स्टेट कहा गया था।

हमारे देश के प्रधान उड़ते हुए कौवा का नाक ढूंढवाने का काम करते हैं आखिरकार पुलिस नाक ढूंढ ही लेती है, पर कटे हुए ना। (सोशल मीडिया, यू ट्यूबर)

प्रधान के कार्यकर्तागण उड़ते हुए पीपल के पेड़ को पकड़ने में देश के पुलिस से लेकर सैनिकों तक का उपयोग कर लेते हैं सिर्फ पीपल के उड़ते हुए पेड़ को , लेकिन पेड़ उड़ता ही रह जाता है। (सोशल मीडिया रिपोर्टर,माइक और मोबाइल लेने वाले)।

प्रधान के शासनकाल में जनता की स्थिति दिनों दिन ऐसी होती जा रही है जैसे क्वाशोर की बीमारी से ग्रस्त बालक क्योंकि ऐसे माता-पिता के पास बच्चों को उचित भोजन देने के लिए उचित खाद्य पदार्थ नहीं होता है।

हमारे देश के प्रधान देश के आमदनी को पूरी तरह से नष्ट कर रहे हैं जिसके कारण समाज में विखडता जा रहा है। लाचार युवा नशों की दौड़ में गोता लगाने को मजबूर है।

प्रधान भोज उड़ाने में मस्त है।

आम आदमी की जो आमदनी है, उस पर टैक्स लगाने का अधिकार जताते हैं कि टैक्स नहीं लगेगा तो देश का विकास कैसे होगा ??

देश का विकास नहीं हो रहा है!!

मोहन नायक देशी नहीं है !!

हमारे देश में काला धन कुबेर ही तो मूल भारतीय है, शेष तो पांच किलुआ,10 हजिरिया है ??

पूरे दिन इसी पर दिमाग खपत करते हैं कि वह कौन सी टैक्स है जिसके प्रहार से जनता को चकनाचूर कर सड़क पर लाकर लाठी, डंडा और गोलियां बरसाई जाय।

आर्थिक गणना कुछ गिने-चुने देश के उद्योगपतियों की आमदनी पर आधारित है। देश की जनता की हालत बद से बदतर है।

हमारे देश के प्रधान ठीक उस सरकार की है जो सिर्फ भैंस ढूंढने के काबिल है और भैंस ढूंढवाते हैं।

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