शिक्षक दिवस: महर्षि अरविन्द जी ने कहा था कि किसी देश का वास्तविक र्निमाता उस देश का शिक्षक होता है : सुरेश चौधरी

सुरेश चौधरी:  आज शिक्षक दिवस है प्रथम उपराष्ट्रपति राधाकृष्ण जी का जन्म दिन, शिक्षक का महत्व कितना है यह मात्र इस श्लोक से ही प्रतीत ही जाता है।

*कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्म सम्मूढचेताः।*
*यच्छ्रेयः स्यान्निश्र्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।। गीता २/७।।*

अंत मे अर्जुन हतास हो कर कहते हैं मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे कृपया उपदेश दें , मैं आपकी शरण हूँ।

यह श्लोक अगर हम गहनता से अध्यन करें तो शिक्षक और गुरु के अंतर को भी दृष्टिगोचर करता है। कृष्ण गुरु तो सदा रहे मित्र भी रहे पर अब अर्जुन उन्हें शिक्षक मान शिक्षा की प्रार्थना कर रहा है। अतः शिक्षक का काम गुरु के कर्मों में से एक मुख्य कर्म है, ज्ञान दे कर शिक्षित करना।

*वसुदेव-सुतं देवं कंस-चाणूर-मर्दनम्।*
*देवकी-परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।*

जगत गुरु अनित्य परमात्मा श्री कृष्ण विश्व के गुरु हैं और वे शिक्षकोत्तम हैं, तभी तो कहा गया है वन्दे कृष्णं जगद्गुरु। आज से 5253 वर्ष पूर्व बसुदेव एवं देवकी के पुत्र बन प्रभु का अवतरण हुआ था पालन पोषण माता यशोदा एवं नन्द राय के पास हुआ।

डॉ. राधाकृष्णन ने एक शिक्षक के रूप में जीवन प्रारंभ किया अतः आज का दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, उनके द्वारा श्रीमद भगवद गीता का अनुपम एवं अद्वितीय अध्यात्मिक विवेचन हुआ, तो भगवद गीता के सृजक स्वयं श्री कृष्ण थे । कर्म ही धर्म है कर्म ही पूजा, इस मन्त्र को दोनों ने प्रसारित किया। नमन, अभिनन्द, वंदन।

गीता आत्म ज्ञान प्रदर्शित अज्ञान विच्छेदनम
मया आश्रय प्रदानं प्रभु परिपूर्ण भक्तवत्सलं
मोक्ष प्राप्तं अति अंत काले प्राप्तम प्रभु दर्शनं
मोहित सस्मितं वक्र भृकुटी नमामि नारायणं
गोपिका मध्य रास रचित कुंजन प्रीत संचितं
निराकार अविनाशी अजन्मते जयति बसुदेवं।

श्री गुरु स्त्रोत्रम में एक श्लोक है :

*न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।*
*तत्त्वज्ञानात् परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥११॥*

गुरु से अधिक कोई तत्व नहीं गुरु से अधिक कोई तप नहीं, तत्व ज्ञान से ऊपर कोई ज्ञान नहीं ऐसे ज्ञान देने वाले गुरु को नमन करता हूँ, अतः, हमारे ग्रन्थ कभी भी व्यक्ति पूजा की समवर्धना नहीं करते, वे तत्व को ही पूजित मानते हैं ।
अपने समाज में हजारों सालों से, व्यास भगवान से लेकर आज तक, श्रेष्ठ गुरु परम्परा चलती आयी है।

व्यक्तिगत रीति से करोड़ों लोग अपने-अपने गुरु को चुनते हैं, श्रद्धा से, भक्ति से वंदना करते हैं, अनेक अच्छे संस्कारों को पाते हैं।
हमारा शास्त्र एवं हमारी संस्कृति तत्व पूजा सिखाती है, व्यक्ति पूजा नहीं। व्यक्ति शाश्वत नहीं, समाज शाश्वत है। अपने समाज में अनेक विभूतियां हुई हैं, आज भी अनेक विद्यमान हैं।
शिक्षक और छात्र का संबंध कुम्हार और माटी सा संबंध है। हमेशा से शिष्य के प्रति गुरु का दायित्व प्रमुख रहता आया है। चाहे वह अतीत में रहा हो या वर्तमान में रहे और यह आवश्यक भी है।
महर्षि अरविन्द जी ने कहा था कि किसी देश का वास्तविक र्निमाता उस देश का शिक्षक होता है। इसी से पता चलता है कि शिक्षक का कितना आदर पूर्वक महत्त्व है। शिक्षा मात्रा ज्ञान को सूचित कराना या बताना या डिग्री भर नहीं होता है,उनका उद्देश्य उत्तरदायी नागरिक का निर्माण करना होता है।
विद्यालय इसीलिए विद्या का मंदिर कहलाता है। यह ज्ञान सोच का केन्द्र, संस्कृति का तीर्थ एवं बौद्धिक स्वतंत्रता का संवाहक कहा और माना जाता है।

विश्व भर में गुरु अर्थार्थ शिक्षक को अतुलनीय माना गया है, एवं तदनुसार विभिन्न दिनों को उनके वंदन स्मरण हेतु नियुक्त किया गया है, सामान्यतः विश्व के करीब १०० देशों में ५ अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है क्यूंकि १९६६ में में यूनेस्को एवं आईएलओ ने इस दिन विश्व भर के शिक्षकों के बारे में चिंता जताई थी और एक संकल्प जारी किया था, १९९४ में यह तय हुआ की प्रतिवर्ष इस दिन शिक्षक दिवस मनाया जाय ।

चीन में २७ अगस्त को कंफ्यूसस के जन्म दिन पर मनाया जाता है तो अमेरिका में ६ मई को, भारत में यह ५ सितम्बर को मनाया जाता है |

मदन मोहन मालवीय के अनुसार (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक), “एक बच्चा, जो आदमी का पिता होता है, उसके मन को ढालना उसके शिक्षक पर बहुत अधिक निर्भर करता है।

यदि वह देशभक्त है और देश के लिए समर्पित है और अपनी जिम्मेदारियों को समझता है, तो वह देशभक्त पुरुषों और महिलाओं की एक जाति को पैदा कर सकता है जो धार्मिकता से ऊपर देश को और सामुदायिक लाभ से ऊपर राष्ट्रीय लाभ को रखेंगे।”

जीवन में सफल होने के लिए शिक्षा सबसे ज्यादा जरुरी है. शिक्षक देश के भविष्य और युवाओं के जीवन को बनाने और उसे आकार देने के लिये सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. प्राचीन काल से ही गुरुओं का हमारे जीवन में बड़ा योगदान रहा है. गुरुओं से प्राप्त ज्ञान और मार्गदर्शन से ही हम सफलता के शिखर तक पहुंच सकते हैं. शिक्षक दिवस पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस दिन शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है.

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस के अवसर पर उनकी स्मृति में सम्पूर्ण भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस (Teacher’s Day) मनाया जाता है. वह एक महान शिक्षक होने के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति तथा दूसरे राष्ट्रपति थे. गुरु का हर एक के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होता है |

सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक और शिक्षक थे और शिक्षा में उनका काफी लगाव था, इसलिए सम्पूर्ण भारत में सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा करने वाले छात्रों को पुरस्कार दिया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि गुरु अर्थार्थ शिक्षक के बिना सही रास्तों पर नहीं चला जा सकता है, वह मार्गदर्शन करते है। तभी तो शिक्षक छात्रों को अपने नियमों में बांधकर अच्छा इंसान बनाते हैं और सही मार्ग प्रशस्त करते रहते है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि जन्म दाता से बढकर महत्व शिक्षक का होता है क्योंकि ज्ञान ही इंसान को व्यक्ति बनाता है, जीने योग्य जीवन देता हैं.

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 में तमिलनाडु के तिरुतनी गॉव में एक गरीब परिवार में हुआ था. आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद पढाई-लिखाई में उनकी काफी रुची थी.

आरंभिक शिक्षा इनकी तिरूवल्लुर के गौड़ी स्कूल और तिरूपति मिशन स्कूल में हुई थी। फिर मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से उन्होंने अपनी पढाई पूरी की थी, 1916 में उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया और मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में इसी विषय के सहायक प्राध्यापक का पद संभाला. 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह 1903 में सिवाकामु के साथ हो गया था. वर्ष 1954 में शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए उन्हें भारत रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया।

हम आपको बता दें कि राजनीति में आने से पहले उन्होंने अपने जीवन के 40 साल अध्यापन को दिए थे. उनका मानना था कि बिना शिक्षा के इंसान कभी भी मंजिल तक नहीं पहुंच सकता है. इसलिए इंसान के जीवन में एक शिक्षक होना बहुत जरुरी है.

भारत में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद राधाकृष्णन को जवाहरलाल नेहरु ने राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करने का आग्रह किया। 1952 तक वह इसी पद पर रहे और उसके बाद उन्हें उपराष्ट्रपति नियुक्त किया गया. राजेन्द्र प्रसाद का कार्यकाल 1962 में समाप्त होने के बाद उनको भारत का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया। 17 अप्रैल 1975 में लंबे समय तक बीमार रहने के बाद उनका निधन हो गया.

*।।शास्त्रों में गुरु का महत्व ।।*
*सूचाकश्चैव वाचको दर्शकश्ताथा I शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरूव: स्मृता: I I*

अर्थात: प्रेरणा देने वाला, सूचना, देने वाला, वक्ता, दर्शक, ज्ञाता शिक्षा देनेवाला, आत्मवोध कराने वाला ये सव छ: प्रकार के गुरु होते है।

उपरोक्त श्लोक कुलावार्ण तंत्र से लिया गया है जिसमे छः प्रकार के गुरुओं का वर्णन है|

व्यवहारिक जगत मै सवसे पहले माता-पिता गुरु होते हैI प्रायः यह ही कहा जाता है की गुरु एक ही होता है, और इस धारणा को परिपुष्ट और दृढ़ किया गया है | परन्तु बहुत से उदहारण मिलते हैं जहां विभिन्न और कई गुरुओं का उल्लेख है, श्रीमद्भागवत में ११वे अध्याय में परमावधूत श्री दत्तात्रेय महाराज ने २४ गुरु किये थे, उन्होंने तो जीवन के हर पायदान पर हर वस्तु ,जीव से कुछ शिक्षा प्राप्त की , यह बताता है कि सीखने के लिए किसी को भी गुरु बना सकते हैं और हमे कहीं से भी सीख मिल सकती है |

पिता से ज्यादा माता नजदीक होती है I इसलिए माँ की जिम्मेदारी शिशु पर अधिक होती है I अत: नारी समाज की शिक्षा दीक्षा नैतिकता पूर्ण होनी चाहिए I जिससे की माँ अपने बच्चो को उचित शिक्षा प्रदान कर सके और हमारे धार्मिक ग्रंथो में एसे कई उदहारण मिलते है I माता मदालसा ,गोपीचंद की माता ,भक्त प्रह्लाद एवं ध्रुव की माताओं ने अपनी प्रतिभा एवं धर्मपूर्ण आचरण एवं ज्ञान की प्रेरणा से अपने पुत्रों को भवसागर से पार करा दिया I

तत्ववेत्ता माताओ में माता मदालसा का नाम सर्वोपरि स्थान पर है इन्होने अपने लोरियों के गीत के माध्यम से अपने छ: पुत्रों को आत्म ज्ञान से भर दिया था जिसके फलस्वरूप वे सब परमनिवृति पूर्वक जीवन-यापन करते हुए अंत में अपने सत्यस्वरुप में लीन हो गए और माता मदालसा ने अपने सातवे पुत्र का नाम अलर्क रक्खा तथा उसको राजनीति की शिक्षा देकर राजनीति के योग्य बनाया और यह भी ध्यान रक्खा की कही ये कही संसार में ही फस कर न रह जाये इस लिए उन्होंने अलर्क के गले में एक ताबीज डाल दी और अलर्क से कहा की जव विपत्ति आये तो इसे खोलकर इसके अन्दर लिखी शिक्षा को ग्रहण कर लेना इससे तेरा परम कल्याण होगा। कालांतर में जव अलर्क पर विप्पत्ति आई तो उसने उस ताबीज को खोल कर देखा की उसमे एक कागज के टुकड़े में निम्नलिखित श्लोक लिखे थे।

*संगः सर्वात्मनाहेयः सचेत् त्यक्तुं न शक्यते।स सद्भिःसह कर्तव्यः साधुसंगो हि भेषजम्॥*
“संग/आसक्ति सर्वथा त्याज्य है; पर यदि ऐसा शक्य न हो तो सज्जनों का संग करना ।

साधु पुरुषों का सहवास जडीबुटी है (हितकारक है) । सभी कामनाओं को छोड़ देना चाहिए यदि सभी कामनाओं को छोड़ने में असमर्थ हो तो मुमुक्षु की कामना करनी चाहिए मुमुक्षु की कमाना संसार की सभी कामनाओं को नष्ट करने की महान औषधि है।”

*गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा ।गुरु साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम: ।।*

अर्थात गुरु को व्रह्मा कहा गया है की जिस प्रकार ब्रह्मा सकल सृष्टि को जन्म देता है उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य को ग्रहण करके उसमे संस्कारों का प्रत्यारोपण करके उसको नया जन्म देता है, उसे द्विज (द्वि मतलब दूसरा और ज मतलब जन्म ) बनाता है । इस लिए गुरु को ब्रह्मा कहा गया है और जिस प्रकार सृष्टि का पालन भगवान् विष्णु करते है ।

गुरु अपने शिष्य का समस्त भार अपने ऊपर ले लेता है इस लिए गुरु को विष्णु कहा गया है। भगवान् शंकर इस स्रष्टि का विनाश करते है और उन्ही की भाति गुरु अपने शिष्य में निहित समस्त विकारों का विनाश कर देता है एक प्रकार से वह अपने शिष्य के वर्तमान स्वरूप को समूल नष्ट करके उसका पुनः निर्माण कर देता है इस लिए गुरु को महेश या शिव कहा गया है ।

एक पूर्ण सतगुरु ही किसी प्राणी को आवागमन के चक्कर से मुक्त कर सकता है इसलिए गुरु को साक्षात् पार व्रह्म परमेश्वर कहा गया है ।

इसके पठन से मन में यह विचार आया कि लिखने वाले ने यह क्या लिख दिया । क्या सचमुच गुरु ऐसा होता है कि उसकी तुलना साक्षात् पार व्रह्म परमेश्वर से कर दी जाये मन ने कहा कि नहीं ये सच नहीं हो सकता तो अपनी नज़र को इधर-उधर दौड़ाया तो पाया कि कबीर दास जी तो यहाँ तक लिख गए है कि :-
सात समुद्र कि मसि करूँ लेखन सब वनराय । सब धरती कागज़ करूँ गुरु गुण लिखा न जाये ।।
गुरु में वह गुण भरे हुए है कि उन्हें लिखा ही नहीं जा सकता है। अगर और गहन विचार करें तो हम पाते हैं कि कबीर दास जी तो गुरु को परमेश्वर से भी बड़ा बता रहें है ।

गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागों पांय । वलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो मिलाय ।।

जब इस दोहे को ध्यान पूर्वक पढने से ज्ञात होता है कि गुरु को इतना महान क्यों कहा गया है । सचमुच यदि गुरु ईश्वर से मिला सकता है तो वह ईश्वर से बड़ा ही हुआ ।

*अखंड मंडलाकारम व्याप्तं एन चराचरम । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नम: ।।*

अर्थात सर्व व्यापी इश्वर को तत्व रूप में अंतर्घट में ही प्रत्यक्ष रूप से दिखा देने वाला ही पूर्ण सतगुरु होता है और हमें इश्वर दर्शन के लिए उसी पूर्ण सतगुरु कि शरण में जाना चाहिए । इस विषय में वहुत सारे लोग कहते हैं कि हम तो नित्य मंदिर जाते हैं और कई लोग कहते हैं कि हम मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजा घर जाते हैं तो फिर हमे गुरु के पास जाने कि क्या जरूरत है तो इस विषय में हमारे ग्रन्थ कहते है कि :-
राम कृष्ण से को बड़े तिंहू ने गुरु कीन्ह । तीन लोक के नायका गुरु आगे आधीन ।।

अर्थात जब इश्वर चाहें खुद ही क्यों न धरती पर आये तो वोह खुद भी किसी पूर्ण गुरु के पास जाता है क्यों कि वह आपने आचरण के द्वारा मानव के लिए उद्धरण प्रस्तुत करता है कि आप इसी रास्ते पर चलो।

किन्तु मानव राम -राम कृष्ण-कृष्ण तो करता है मगार जो राम या कृष्ण ने अपने जीवन में किया वह नहीं करता है। अत: हमें आवश्यकता है ऐसे किसी पूर्ण सत गुरु कि जो हमारे प्रज्ञा चक्षु खोल दे । हमारे दिव्य नेत्र खोल कर हमें हमारे अंतर्घट में ही परमात्मा का साक्षात्कार करा दे।

मैंने सूक्ष्म ढंग से गुरु की महिमा लिखने का प्रयास किया है, शास्त्रों में तो कहा गया है की सभी समुद्रों के जल की स्याही बना दें सभी पेड़ों की कलम और समूची पृथ्वी को कागद और गुरु की महिमा लिखें तो भी यह कम ही होगी।

गुरु शिक्षक की महिमा अपरम्पार है जो न केवल भारतीय संस्कृति में बल्कि विश्व के प्रत्येक देश में सर्व व्यापी है। मैंने तो कहीं पढ़ा है की जापान में तो शिक्षक को मंत्री से ज्यादा महत्व है, अगर प्रोटोकोल अनुसार शिक्षक कहीं हैं तो उन्हें आगे व्ही आई पी के रूप में प्राथमिकता दी जाती है। उन पर मुकदमा सामान्य प्रक्रिया से नही होता।

भारत में राधाकृष्णन जी को याद कर हम शिक्षक दिवस मनाते हैं, वे वरेण्य पूजनीय थे इसमें कोई मतभेद नहीं, उनकी सरलता के किस्से मैंने डॉ. छागला की पुस्तक रोजेज इन दिसम्बर में १९७४ में पढ़े थे, कैसे वे राष्ट्रपति होते हुए लन्दन की सड़कों पर निकल गए अपने पब्लिशर से मिलने । उनकी सरलता सहजता आज कहाँ किसी राजनेता में मिलेगी।
पर क्या ही सुन्दर होता हम अपनी संस्कृति को अक्षुण रखते हुए अपने आदिगुरू शंकराचार्य की स्मृति में भी इस दिवस को मनाते, क्यों न हम ५ सितम्बर को ही सही शंकराचार्य को भी स्मरण करें जिसने भारतीय दर्शन को नयी परिभाषा दी, अपने ज्ञान से अंध में घिरे भारतीय अन्धविश्वास को दूर कर नयी रौशनी दी।

अंत में जाते जाते मन की व्यथा…..
*”नहीं पिता सम गुरु रहे, कैसे नवाउ माथ”*
*”निज मन में श्रद्धा बिना, जुड़े कभी ना हाथ”*

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