राज्य किसी लड़की और लड़के के घर से भागने को कैसे रोक सकता है ?

सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के आपसी सहमति वाले रिश्तों से जुड़े मामलों में ‘बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम’ (POCSO) लागू करने पर चिंता जताई है।

कोर्ट ने सवाल किया कि क्या लड़का-लड़की के घर से भागने के हर मामले में अपने आप POCSO के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए, जबकि यह कानून बच्चों के यौन शोषण और उत्पीड़न से निपटने के लिए बनाया गया है।

किशोरों की प्राइवेसी (निजता) और भलाई से जुड़े एक मामले पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने उन मामलों की ओर ध्यान दिलाया जिनमें किशोर लड़कियां अपने पार्टनर के साथ घर छोड़ देती हैं और माता-पिता कथित तौर पर आपराधिक कार्यवाही शुरू कर देते हैं। इससे बच्चों की सुरक्षा और किशोरों के रिश्तों को अपराध मानने के बीच की मुश्किल रेखा पर ध्यान केंद्रित हुआ।

यह मुद्दा 2023 के कलकत्ता हाई कोर्ट के एक फैसले से जुड़ी कार्यवाही के दौरान उठा, जिसमें किशोर लड़कियों और उनकी यौन इच्छाओं के बारे में विवादास्पद टिप्पणियां की गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में उन टिप्पणियों को खारिज कर दिया और किशोरों की प्राइवेसी और सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों की जांच के लिए मामले की सुनवाई जारी रखी।

सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने एक ऐसे मामले का ज़िक्र किया जिसमें एक नाबालिग लड़की 25 साल के युवक के साथ चली गई थी और बाद में उससे एक बच्चा भी हुआ; साथ ही उन्होंने POCSO सिस्टम के कामकाज को लेकर व्यापक चिंताओं की ओर भी इशारा किया।

उन्होंने कहा कि आपसी सहमति वाले रिश्तों में शामिल किशोरों पर इस कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है और किशोरों की भलाई, पुनर्वास और संवेदनशीलता (sensitisation) से जुड़े उपायों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि इस मुद्दे पर पहले ही सिफारिशें की जा चुकी हैं और अगर उन्हें स्वीकार कर लिया जाता है, तो उन्हें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया जा सकता है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की डिवीजन बेंच ने सवाल किया कि क्या राज्य असल में किशोरों को रिश्ते बनाने और एक साथ घर छोड़ने से रोक सकता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “राज्य किसी लड़की और लड़के के घर से भागने को कैसे रोक सकता है ? POCSO बच्चों के यौन उत्पीड़न और शोषण से जुड़ा कानून है।”

कोर्ट ने 15 से 18 साल की उम्र को संवेदनशील और प्रयोग करने की उम्र बताया।

बेंच ने आगे कहा कि 16 से 18 साल की उम्र वालों से जुड़े कुछ मामलों में, अपनी “इज्जत” बचाने की कोशिश में माता-पिता किशोरों के एक साथ घर छोड़ने के बाद उन पर आपराधिक आरोप लगवा सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि 2012 में सहमति की उम्र (age of consent) 16 से बढ़ाकर 18 साल किए जाने से पहले भी किशोरों के रिश्ते होते थे, और इस बात पर ज़ोर दिया कि इस मुद्दे पर जो भी निर्देश तैयार किए जाएं, वे व्यावहारिक और लागू करने योग्य होने चाहिए।

कोर्ट ने POCSO मामलों की निगरानी में हाई कोर्ट की बाल अधिकार समितियों और राज्य सरकारों की भूमिका का भी ज़िक्र किया।

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