माना कि प्रधानमंत्री महोदय गृहनीति में और आर्थिक समस्याओं को हल करने में पूर्णतः विफल है : शैलेश कुमार

प्रधानमंत्री महोदय की नीतिगत फसलों से सहमत होना या ना होना एक अलग बात है।

अगर प्रधानमंत्री महोदय द्वारा विदेश नीति के तहत आर्थिक क्षेत्र अर्थात किसी उद्योगपतियों को किसी राष्ट्र में बिस्तर समेटने को कहा जाए तो हमें इस बिंदु को गंभीरता से लेना चाहिए ना की जश्न मानना चाहिए।

माना कि प्रधानमंत्री महोदय गृहनीति में और आर्थिक समस्याओं को हल करने में पूर्णतः विफल है और हर मंत्रालय लूट केंद्र तथा अपराध तंत्र के जाल में कैद हैं, इसका मतलब यह नहीं कि विदेश विंदु पर किड़किडी होने पर हम मजाक उड़ाये। यहां प्रधानमंत्री महोदय की शाख हमारे (सभी नागरिक) शाख से संबद्ध है।

क्योंकि किसी राष्ट्र से आर्थिक संबंध बनाने के लिए मैराथन मीटिंग किया जाता है। सावधानीपूर्वक दोनों देश के आर्थिक विशेषज्ञ समीक्षा करते हैं दोनों अपने-अपने फायदे सोचते हैं उसके बाद ही किसी देश का प्लांट संबंधित देश में लगाई जाती है।

द्विपक्षीय वार्ता का दौरा 6 महीना से साल भर तक चलता रहता है।

आर्थिक नीति के तहत ही हमारे देश की कंपनियां किसी और देश में जाकर प्लांट स्थापित करती है जिसका सारा श्रेय केंद्र को दिया जाता है।

केंद्र का संचालन प्रधानमंत्री महोदय के हाथों में होता है अर्थात प्रधानमंत्री महोदय को ऐसे राष्ट्रों के विरुद्ध दो कदम उठाने की आवश्यकता है।

पहला, कदम उस राष्ट्र पर बाहरी दबाव बनाने का प्रयास करें ताकि यूनिट वहां अनवरत कार्य करता रहे।

दूसरा, उस राष्ट्र से आर्थिक नीति के तहत संबंध विच्छेद कर लेना चाहिए।

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