अप्रैल-जून तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 7.8% पर , पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
गर्ग 7.8% की जगह 2.6% ग्रोथ बता रहे हैं।
कुछ एडजस्टमेंट के बाद तो तकरीबन जीरो ग्रोथ। उनका एक बड़ा अहम सवाल है कि पिछले साल की एक ही तिमाही की GDP करीब ₹86 लाख करोड़ से घटकर ₹80 लाख करोड़ कैसे हो गई?
गर्ग 2.6% ग्रोथ की बात क्यों कह रहे हैं।
पिछले साल अप्रैल-जून में देश की GDP पहले ₹86 लाख करोड़ बताई गई थी। फिर सरकार ने GDP मापने का तरीका बदला और वही पुराना आंकड़ा दोबारा निकाला।
अब कहा गया कि पिछले साल की GDP ₹86 लाख करोड़ नहीं, बल्कि ₹80 लाख करोड़ थी। इस साल की 88 लाख करोड़ रही तो नॉमिनल GDP ग्रोथ 10.3% बनी।
महंगाई घटाई गई तो रियल जीडीपी ग्रोथ 7.8% रही।
गर्ग का कहना है कि अगर पिछले साल का वह आंकड़ा ₹86 लाख करोड़ मानें और इस साल का ₹88 लाख करोड़, तो बढ़ोतरी करीब 2.6% बैठती है।
इसे एक दुकान के उदाहरण से समझिए।
मान लीजिए किसी दुकानदार की पिछले साल बिक्री ₹86 लाख हुई और इस साल ₹88 लाख। सीधी नजर में बिक्री करीब 2.6% बढ़ी।
लेकिन अब नया हिसाब लगाने के बाद कहा जाए कि पिछले साल की बिक्री ₹86 लाख नहीं, ₹80 लाख थी, तो इस साल की बढ़ोतरी बहुत ज्यादा दिखाई देने लगेगी। 2.6% से बढ़कर 10.3%।
यहां सवाल यह नहीं है कि नया हिसाब गलत है। सवाल यह है कि पिछले साल के ₹86 लाख को ₹80 लाख क्यों किया गया ?
आखिर ₹6 लाख करोड़ का फर्क कहां से आया।
सरकार ने मोटे तौर पर कहा है कि नया डेटा आया, हिसाब लगाने का तरीका बदला और GDP की नई सीरीज तैयार की गई। लेकिन इतने बड़े अंतर का पूरा हिसाब साफ तरीके से सामने नहीं रखा गया है कि किस बदलाव से कितना फर्क पड़ा।
अगर ऐसा है, मतलब कि जीडीपी पिछले साल 86 नहीं 80 लाख करोड़ थी। तो पुरानी जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े भी घट सकते हैं।
मिसाल के तौर पर, पहले किसी साल की GDP 100 और अगले साल 110 थी। तो ग्रोथ 10% हुई। लेकिन नए हिसाब में पहला साल 95 और दूसरा साल 100 निकला तो ग्रोथ करीब 5.3% रह जाएगी।
यहां एक और सवाल उठता है।
अगर भारत की अर्थव्यवस्था सच में लगातार 7-8% की तेज रफ्तार से बढ़ रही है तो उसका असर जमीन पर कहां दिख रहा है ?
मैंने 2003 से 2011 के आसपास का दौर भी देखा है। तब भी भारत की GDP तेज रफ्तार से बढ़ रही थी। कई सालों में ग्रोथ 9-10% तक पहुंच गई थी। लेकिन तब फर्क सिर्फ आंकड़ों में नहीं दिखता था। आदमी की जिंदगी में दिखता था।
लोगों की कमाई बढ़ रही थी। मुझे याद है कि हमारे गांव में उस वक्त एक-दो घरों में मोटरसाइकल थी। ज्यादातर तो एक ही आदमी बाइक से चलता था, क्योंकि वो मैकेनिक था। लोग बाइक की आवाज सुनते ही उसका नाम लेकर कह देते थे कि फलनवा जा रहा होगा। और 100 में से 99 बार वो सही होते थे।
लेकिन, जब ग्रोथ रेट बढ़ी तो साइकल से चलने वाले बहुत से लोगों ने मोटरसाइकल ले ली। मोटरसाइकल वाले कार और ट्रैक्टर खरीदने लगे। गांवों में पक्के घर बनने लगे। टीवी, फ्रिज और दूसरी चीजें ज्यादा घरों में पहुंचने लगीं। फिर 2006 में मनरेगा ने तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांति कर दी। मुझे याद है कि उस वक्त हमारे गांव में धान रोपने की मजदूरी 10 से 20 रुपये थी।
लेकिन, मनरेगा आने के बाद ये एकदम से 70-80 रुपये हो गई। कई बड़े उद्योगपतियों ने तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार की खुलकर आलोचना करने लगे थे। उनका कहना था कि जब मनरेगा ही गांव में मजदूरों को काम देने लगेगी, तो शहर में सस्ते मजदूर कहां से मिलेंगे। ये भी उस दौर का एक पहलू था कि उद्योगपति सरकार की खुलकर आलोचना करते थे। और अखबार भी मनरेगा की खबर के बगल में उद्योगपतियों की आलोचना छापते थे।
मनरेगा ने मजदूरों के हाथ पैसा आया, तो उन्होंने खूब खर्च भी किया। अर्थव्यवस्था में भारी डिमांड बनी। दुकानदारों की बिक्री बढ़ी। उन्होंने ज्यादा माल मंगाया। इससे कंपनियों की बिक्री बढ़ी। तो उन्होंने निवेश बढ़ाया। रोजगार के मौके बढ़े। अर्थशास्त्र का बड़ा सिंपल नियम है कि जब अमीरों की जेब में ज्यादा पैसा जाता है, तो वो सिर्फ सप्लाई क्रिएट करता। ज्यादा सप्लाई का मतलब मंदी का खतरा।
लेकिन, गरीब की जेब में पैसा आता है, तो वो डिमांड क्रिएट करता है। जिससे इकोनॉमी बढ़ती है।
2008 में छठा वेतन आयोग लगा, तो सरकारी नौकरी वालों के हाथ तो जैसे खजाना लग गया था। उस वेतन आयोग में सैलरी अब तक की सबसे ज्यादा बढ़ी थी, पूरे 54 प्रतिशत। लाखों का एरियर मिला। ये कितना ज्यादा बढ़ोतरी है, इसका अंदाजा आप इससे लगाइए कि 2016 में 7वें वेतन आयोग में सैलरी सिर्फ 14% बढ़ी। लेकिन छठे वेतन आयोग के बाद सड़कों को चारपहिया की भरमार हो गई थी। नया घर और जमीन तो सब्जियों की तरह लेने लगे थे लोग।
यही असली बात है। जब अर्थव्यवस्था बढ़ती है, तो उसका असर सिर्फ बड़े बिजनेसमैन,बड़ी कंपनियों और बड़े शहरों में में नहीं दिखना चाहिए। वो गांव की दुकान, मजदूर की मजदूरी और आम परिवार के खर्च में भी दिखना चाहिए।
अगर देश की अर्थव्यवस्था सच में 8% के करीब बढ़ रही है, तो इसका मतलब बहुत बड़ा है। मिसाल के तौर पर, 8% ग्रोथ पांच साल चले तो अर्थव्यवस्था करीब 47% बड़ी हो जाती है। दस साल तक चले तो लगभग दोगुनी।
इतनी बड़ी आर्थिक बढ़त का मतलब सिर्फ सरकारी प्रेस रिलीज में बड़े नंबर नहीं हो सकता।
अगर सच में ग्रोथ है, तो उसका असर कई जगहों पर दिखेगा।
लोगों की असली कमाई बढ़ेगी। ज्यादा लोगों को अच्छी नौकरियां मिलेंगी। गांवों में खर्च करने की ताकत बढ़ेगी। छोटी-मझोली कंपनियों और दुकानदारों की बिक्री बढ़ेगी। लोग बेहतर घर, गाड़ी और दूसरी सुविधाएं खरीदेंगे। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ेगा। कंपनियां उत्पादन क्षमता बढ़ाएंगी। प्राइवेट इनवेस्टमें तेज होगा। सरकारी खजाने में टैक्स ज्यादा आएगा। शेयर बाजार भी इसके साथ बूम करेगा।
हालांकि, ऐसा भी हो सकता है कि जीडीपी 8% बढ़े और उसका फायदा देश की आम जनता को न मिले। अब मान लीजिए देश की GDP में 8% बढ़ोतरी हुई, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा सिर्फ कुछ बड़े सेक्टरों में चला गया।
जैसे सरकारी खर्च, बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, बड़ी कंपनियां या किसी खास उद्योग का तेज उछाल। तब GDP तो तेजी से बढ़ सकती है, लेकिन उसका फायदा करोड़ों लोगों तक उसी रफ्तार से नहीं पहुंचेगा।
इसे बहुत आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। अब मान लीजिए किसी गांव में 100 लोग हैं। उनकी कुल सालाना कमाई ₹100 करोड़ से बढ़कर ₹108 करोड़ हो गई। GDP 8% बढ़ गई।
लेकिन अगर उस ₹8 करोड़ की अतिरिक्त कमाई में ₹6 करोड़ सिर्फ दो लोगों को मिल गए और बाकी 98 लोगों में सिर्फ ₹2 करोड़ बंटे, तो कागज पर पूरा गांव 8% ज्यादा अमीर हो गया। लेकिन गांव के ज्यादातर लोगों की जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव शायद नहीं दिखेगा। अगर बदलाव दिखेगा, तो सिर्फ उन्हीं दो लोगों की जिंदगी और कमाई में, जिन्हें ₹8 करोड़ में से ₹6 करोड़ अकेले मिल गए हैं।
