लखनऊ (निशांत सक्सेना)———– जहां एक ओर सरकार हवाओं की बढ़ती गर्मी पर लगाम लगाने के लिए तमाम सकारात्मक पहल कर रही है, वहीं उन्हीं हवाओं से ऊर्जा बनाने के मामले में भारत सरकार की दृढ़ता भी साफ दिख रही है.
भारत में पहले से ही वैश्विक ब्लेड उत्पादन का 11% और टावरों और गियरबॉक्स का 7-12% हिस्सा है. चूंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजार चीन से परे भी सप्लाई चेंस का रुख करना चाह रहे हैं, इसलिए भारत एक आकर्षक सप्लायर बनता दिख सकता है.
क्या बनाता है भारत को विंड एनेर्जी में खास?
- भारत के पास पहले से ही चार राज्यों में 11.5 गीगावॉट नैसेल (एक तरह का कंटेनर जिसके अंदर विंड टर्बाइन का गियर बॉक्स वगैरह पैक होता है) विनिर्माण क्षमता मौजूद है. घरेलू मांग में कमी के कारण वर्तमान में इस मौजूदा बुनियादी ढांचे का कम उपयोग हो रहा है, जिससे निर्यात के लिए अवसर मिल रहा है.
- वैश्विक स्तर पर विंड एनेर्जी सेटअप में अचानक वृद्धि, 2022 के 69 गीगावॉट से 2027 में अनुमानित 122 गीगावॉट तक, के चलते दुनिया भर इससे जुड़े निर्माण में तेज़ी की आवश्यकता होगी. भारत के लिए यह एक बढ़िया मौका होगा.
- वैश्विक आपूर्ति में क्रमशः 11%, 7% और 12% कि हिस्सेदरी के साथ भारत ब्लेड, टावर, और गियरबॉक्स जैसे कौम्पोनेंट्स के मामले में बढ़िया स्थिति में है.
- वैश्विक पवन कंपनियां चीन से परे सप्लाई चेंस बनाने पर विचार कर रही हैं. ऐसी जगह जहां वर्तमान में अधिकांश कौम्पोनेंट्स का उत्पादन किया जाता है. इस लिहाज से भारत एक रणनीतिक विकल्प प्रदान करता है.
भारत के लिए प्रमुख चुनौतियां
- घरेलू पवन बाज़ार की मौजूदा स्तर से महत्वपूर्ण वृद्धि महत्वपूर्ण है, क्योंकि निर्माता स्थानीय मांग के बिना केवल निर्यात के लिए निवेश करने की संभावना नहीं रखते हैं.
- लागत-प्रतिस्पर्धा में सुधार होना चाहिए. मौजूदा भारतीय पवन टर्बाइनों की कीमत चीनी मॉडलों से 30-60% अधिक है. भारत के लिए कच्चे माल, घटकों और करों/शुल्कों से संबंधित लागत कम करना महत्वपूर्ण है.
- भारतीय बाजार के लिए निर्मित 2-3.6 मेगावाट टर्बाइनों से आगे अब उत्पाद के आकार और तकनीकी क्षमताओं का विस्तार होना चाहिए.
कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि सही नीतिगत माहौल और बड़े पैमाने पर निवेश के साथ, भारत खुद को पवन प्रौद्योगिकी के एक प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित कर सकता है.
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