
इस संबंध में गांव के ग्राम प्रधान पान सिंह का कहना है कि “गाँव में रोजगार का कोई साधन नहीं होने की वजह से लोग पलायन कर रहे हैं। नौजवान दिल्ली, मुंबई, सूरत, अमृतसर और अन्य शहरों के होटलों और ढाबों में काम करने को मजबूर हैं। ज्यादा आमदनी के लिए वह अपने बच्चों को भी साथ ले जा रहे हैं। इसीलिए अब गाँव में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की संख्या धीरे धीरे घटती जा रही है। गांव में रोजगार गारंटी ‘मनरेगा’ का जो काम आता है, वह केवल एक या दो महीने के लिए ही आता है। उसके बाद 6 महीने फिर सारे काम रुक जाते हैं। इसीलिए अब युवा मनरेगा का काम छोड़कर महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं।” इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता नीलम ग्रेंड़ी का कहना है कि “पिंगलों गाँव में भले ही साक्षरता की दर अधिक है, लेकिन रोजगार की दर बहुत कम है, जो चिंता का विषय है। इसकी वजह से गाँव में गरीबी भी बढ़ती जा रही है। इसकी मार सबसे अधिक बच्चे और युवा झेल रहे हैं। जिसकी वजह से वह अपना भविष्य नहीं बना पाते हैं। वहीं दूसरी ओर गाँव में बंदरों के बढ़ते आतंक से खेती किसानी भी चौपट हो रही है।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की सितंबर 2023 के आंकड़ों के अनुसार देश के ग्रामीण क्षेत्रों में पहले की अपेक्षा बेरोजगारी की दर में कमी आई है। अगस्त 2023 में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर जहां 7.11 प्रतिशत थी वहीं एक माह बाद ही सितंबर 2023 में यह आंकड़ा घटकर 6.20 प्रतिशत हो गया था। बेशक यह आंकड़ा सुखद कहा जा सकता है। लेकिन उत्तराखंड के इस दूर दराज पिंगलों गाँव में जिस प्रकार से युवा रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं,
शिक्षित होने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। यह सच्चाई कहीं न कहीं इस आंकड़े को आईना दिखा रहा है। जरूरत इस बात की है कि नीतियाँ इस प्रकार बनाई जाएं जिससे कि ग्रामीणों को उनके गाँव में ही रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें और उनके बच्चों को अपनी इच्छाओं का गला न घोटना पड़े. (चरखा फीचर)