लखनऊ (निशांत सक्सेना) —- हर साल मानसून के साथ असम में बाढ़ की खबरें भी आने लगती हैं। नदियां उफान पर होती हैं, गांव डूब जाते हैं, लाखों लोगों को घर छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ता है।
आम तौर पर इसकी वजह भारी बारिश को माना जाता है। लेकिन नई ब्रीफिंग बताती है कि अब असम की बाढ़ को सिर्फ़ मानसून की बारिश से जोड़कर नहीं समझा जा सकता।
Climate Trends की नई ब्रीफिंग के मुताबिक असम में बाढ़ अब पहले से कहीं अधिक जटिल और विनाशकारी होती जा रही है। इसकी वजह सिर्फ़ तेज़ बारिश नहीं है।
जलवायु परिवर्तन, हिमालय में ग्लेशियरों और बर्फ़ का तेजी से पिघलना, ऊपरी इलाकों से बढ़ता पानी, भूस्खलन, नदी के साथ बहकर आने वाली गाद और बढ़ता नदी कटाव, ये सभी मिलकर बाढ़ के खतरे को पहले से कहीं अधिक गंभीर बना रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक असम में बाढ़ अब “कंपाउंड फ्लड इवेंट” का रूप ले रही है। यानी कई प्राकृतिक घटनाएं एक साथ घटती हैं और एक-दूसरे का असर बढ़ा देती हैं। कहीं लगातार भारी बारिश होती है, तो दूसरी तरफ़ हिमालय में बर्फ़ और ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं।
पहाड़ों में भूस्खलन होता है, जिससे बड़ी मात्रा में मिट्टी और गाद नदियों तक पहुंचती है। इसके बाद ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों में पानी और गाद दोनों बढ़ जाते हैं। नतीजा यह होता है कि बाढ़ पहले से कहीं ज्यादा व्यापक और विनाशकारी हो जाती है।
ब्रीफिंग में शामिल जलवायु मॉडल बताते हैं कि भविष्य में असम में अत्यधिक बारिश की घटनाएं 5 से 38 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। वहीं बाढ़ की घटनाओं में 25 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि होने का अनुमान है। यानी आने वाले वर्षों में सिर्फ़ बाढ़ की आवृत्ति ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि उसकी तीव्रता भी बढ़ सकती है।
असम पहले से ही देश के सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्यों में शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ संभावित क्षेत्र में आता है। हर साल औसतन 9.31 लाख हेक्टेयर भूमि जलमग्न होती है और इससे करीब 200 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है। रिपोर्ट कहती है कि यह सिर्फ़ प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान है। खेती, आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन और सामाजिक प्रभावों की पूरी कीमत इन आंकड़ों में शामिल नहीं होती।
बाढ़ की बदलती तस्वीर में ब्रह्मपुत्र नदी की भूमिका भी तेजी से बदल रही है। रिपोर्ट का अनुमान है कि भविष्य में नदी का वार्षिक जल प्रवाह 13 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इसके साथ ही नदी में बहकर आने वाली गाद लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसका मतलब है कि नदी सिर्फ़ ज्यादा पानी ही नहीं लाएगी, बल्कि ज्यादा तलछट भी लाएगी, जिससे नदी का रास्ता बदलने, तटबंधों पर दबाव बढ़ने और नदी कटाव तेज़ होने का खतरा भी बढ़ेगा।
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष भविष्य को लेकर है। यदि दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो 2080 तक आज जो बाढ़ हर 10 साल में एक बार आती है, वह हर दो साल में आने वाली घटना बन सकती है। यानी जो घटनाएं आज असाधारण मानी जाती हैं, वे भविष्य में सामान्य बन सकती हैं।
ब्रीफिंग का कहना है कि बदलती जलवायु के दौर में बाढ़ प्रबंधन की सोच भी बदलनी होगी। सिर्फ़ तटबंध बनाना या राहत कार्य चलाना अब पर्याप्त नहीं होगा।
पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन को ध्यान में रखकर योजना बनाने, बेहतर मौसम पूर्वानुमान, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, नदी प्रबंधन, भूमि उपयोग की वैज्ञानिक योजना और जलवायु के अनुरूप ढलने वाली नीतियों पर तेजी से काम करने की जरूरत है।
असम की यह कहानी सिर्फ़ एक राज्य की कहानी नहीं है। यह बताती है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह प्राकृतिक आपदाओं का स्वरूप बदल रहा है। अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं रह गया कि कितनी बारिश हुई।
सवाल यह भी है कि ग्लेशियर कितनी तेजी से पिघले, पहाड़ों से कितना पानी और गाद नीचे आई, नदी का बहाव कितना बदला और उसके किनारों पर कितने लोग रहते हैं। यानी असम की बाढ़ अब सिर्फ़ मानसून की कहानी नहीं रही। यह बदलती जलवायु, हिमालय और ब्रह्मपुत्र के बदलते रिश्ते की कहानी है, जिसे समझे बिना भविष्य की बाढ़ से निपटना मुश्किल होगा।
