अब सिर्फ़ टैरिफ की नहीं, जलवायु की भी बात कर रहे हैं व्यापार समझौते,

लखनऊ (निशांत सक्सेना): अब सिर्फ़ टैरिफ की नहीं, जलवायु की भी बात कर रहे हैं व्यापार समझौते, नई वैश्विक पहल में दिखा बदलता रुझान

दुनिया में जलवायु परिवर्तन पर बातचीत अब सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र के मंचों और COP सम्मेलनों तक सीमित नहीं रह गई है।

अब इसकी झलक व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौतों में भी दिखाई देने लगी है।

यानी देश अब सिर्फ़ यह तय नहीं कर रहे कि किन वस्तुओं पर शुल्क कम होगा या व्यापार कैसे बढ़ेगा। वे यह भी तय कर रहे हैं कि स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों, कम-कार्बन उद्योगों और जलवायु सहयोग में साथ कैसे काम किया जाएगा।

इसी बदलते रुझान को समझने के लिए International Institute for Sustainable Development (IISD) ने Trade & Climate Tracker लॉन्च किया है। यह दुनिया का पहला ऐसा ऑनलाइन मंच है, जो मुख्यधारा के व्यापार और आर्थिक सहयोग समझौतों में जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े प्रावधानों का वैश्विक स्तर पर विश्लेषण करता है।

ट्रैकर में 1 जनवरी 2025 के बाद हस्ताक्षर किए गए 71 व्यापार और आर्थिक सहयोग समझौतों को दर्ज किया गया है। इनमें देखा गया है कि कौन-से समझौते एनर्जी ट्रांजिशन, जलवायु सहयोग, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और भारी उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन को बढ़ावा दे रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि व्यापार समझौतों की प्रकृति तेजी से बदल रही है।

पहले इनका मुख्य उद्देश्य आयात-निर्यात को आसान बनाना और शुल्क कम करना होता था। लेकिन अब ये समझौते ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने, औद्योगिक विकास और जलवायु लक्ष्यों को साथ लेकर चलने का माध्यम भी बन रहे हैं।

ट्रैकर में जिन 46 समझौतों का पूरा पाठ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, उनके विश्लेषण से कई महत्वपूर्ण रुझान सामने आए हैं।

इनमें 67 प्रतिशत समझौतों में ऊर्जा सहयोग से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इनमें स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, बिजली ढांचा और अन्य ऊर्जा सहयोग के उपाय शामिल हैं।

इसी तरह 59 प्रतिशत समझौतों में जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इनमें उत्सर्जन घटाने, जलवायु सहयोग और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक 54 प्रतिशत समझौतों में Critical Raw Materials (महत्वपूर्ण खनिजों) का उल्लेख है। ये वही खनिज हैं जिनकी जरूरत बैटरियों, सौर पैनलों, पवन टर्बाइनों और अन्य स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के निर्माण में होती है। इन समझौतों का उद्देश्य इन खनिजों की सुरक्षित और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना है।

वहीं 37 प्रतिशत समझौतों में रिन्यूएबल एनर्जी सहयोग को विशेष रूप से शामिल किया गया है। यानी सौर, पवन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के विकास को व्यापार और आर्थिक सहयोग का हिस्सा बनाया जा रहा है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि यह बदलाव सिर्फ़ उन देशों तक सीमित नहीं है जिन्हें पारंपरिक रूप से जलवायु कार्रवाई का समर्थक माना जाता है।

अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग आर्थिक प्राथमिकताओं वाले देश भी अब व्यापार समझौतों के जरिए ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों और स्वच्छ औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत के लिए यह रुझान खास महत्व रखता है।

भारत एक ओर यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और कई अन्य देशों के साथ व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है। दूसरी ओर देश रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी निर्माण और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने पर भी तेजी से काम कर रहा है।

ऐसे में आने वाले वर्षों में व्यापार समझौते सिर्फ़ निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं रहेंगे। वे यह भी तय करेंगे कि भारत वैश्विक एनर्जी ट्रांजिशन में अपनी भूमिका कितनी मजबूत कर पाता है और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसकी हिस्सेदारी कितनी बढ़ती है।

यह रिपोर्ट एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है।

जलवायु परिवर्तन और व्यापार को अब अलग-अलग विषय नहीं माना जा रहा।

दुनिया की नई आर्थिक साझेदारियों में दोनों एक-दूसरे से तेजी से जुड़ रहे हैं।

यानी भविष्य के व्यापार समझौते सिर्फ़ बाज़ारों तक पहुंच तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु सहयोग और हरित उद्योगों की दिशा क्या होगी।

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