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उन्मुक्त खुला आकाश, पहाड़ों के चरण पखारती महानदियां, मिलन और समरसता का संदेश प्रवाहित करता संगम, हवाओं में नित नूतनता लिए प्रकृति का महिमागान और पंचतत्वों का विराट समागम, जहाँ सृष्टि हर पल उल्लास और उमंग से भरी हुई खुद भी हिलोरें लेती है, और उसे भी ताजगी देती है जो यहाँ सायास या अनायास आ जाता है।
इन सबके बावजूद कैलाश पर्वत या कि किसी महाद्वीप की तरह बेणेश्वर टापू एकदम शांत, स्थिर और धीर-गंभीर रहता हुआ सदियों से लोेक मंगल का संगीत सुना रहा है। कभी हवाओं के संग द्वीप तैरता हुआ लगता है, कभी एकदम स्थितप्रज्ञ होकर समाधि में लीन।
कुल मिलाकर यह वही दिव्य धरा है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण के लीलावतार मावजी महाराज ने तपस्या की, खूब साहित्य सृजित किया और त्रिकालज्ञ तत्ववेत्ता की तरह दुनिया को उसका मर्म भी समझाया और भविष्य का भी ज्ञान दिया।
कालचक्र के पहिये ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए, बेणेश्वर का स्वरूप भी बदलता गया। जंगल में मंगल की बातें अब रवाँ होती जा रही हैं क्योंकि अब न जंगल रहा है, न जमीन, न प्रकृति का उन्मुक्त आँचल बचा हुआ रहा है, न नदियों की स्निग्ध धाराओं की पावनता।
किसी जमाने में बेणश्वर सभी का हुआ करता था, सभी जाति, धर्मों और वर्गों के लोग इसे अपना मानकर टापू का आनंद पाते थे, टापू को अपना समझकर इसके साथ आत्मीयता का रंग मिलाते हुए इस पावन धरा से ऊर्जित होकर लौटते थे और बार-बार यहाँ आकर संगम में स्नान, दैव दर्शन और प्रकृति के आँगन में ताजगी पाने को मचल उठते थे।
पदार्थ तत्वों की महामाया ने हम सभी को ऎसा घेर लिया कि अब बेणेश्वर सबका नहीं रहा। बेणेश्वर के मन्दिरों, धर्मस्थलों, नदियों के तटों आदि सब को भी हमने आपस में बाँट लिया, जाति-धर्मों और धंधों की मानसिकता ने बेणेश्वर को अखण्ड नहीं रहने दिया।
अब बेणेश्वर को सब लोग अपना नहीं कह सकते। बहुत सारे लोग अब बेणेश्वर टापू को बाँट कर देखते हैं। मन्दिरों को बाँट दिया, पहाड़ी क्षेत्र पर हमने अपने-अपने समाज और संगठन के प्रासाद खड़े कर लिए, अपनी-अपनी धर्मशालाएं बना डाली और बेणेश्वर को अपने कब्जे में कर लिया।
वह विराट एकरूप वैभव, आक्षितिज पसरी जमीन और जलराशि सब कुछ बंट गया। बेणेश्वर बहुत दुःखी है पर इसके दर्द को कौन समझ सकता है। जो द्वीप किसी जमाने में वेगवती नदियों से घिरा रहकर बरसात के चार-पाँच माहों तक एकान्तिक साधना का वैश्विक तीर्थ हुआ करता था, आज भीड़-भडक्के और कारोबारी मानसिकता ने सब कुछ छीन लिया।
जिन नदियों को भरोसा था कि आने वाली पीढ़ियां उनके सहोदर बेणेश्वर टापू को हरा-भरा बनाए रखने और इसे हरित क्षेत्र के रूप में अक्षय कीर्ति देंगी, वह भरोसा अब पूरा टूट चुका है।
कितना अच्छा होता कि हम बेणेश्वर को अब तक लाखों वृक्षों से सजा देते और दुनिया में हरित द्वीप के रूप में स्थापित करने में अपनी भागीदारी निभाते। हमारे पास मीलों पसरी खाली जमीन थी, सिंचाई के लिए नदियों का अखूट पानी था, पर हमारी मानसिकता नहीं थी।
हमने पदार्थ को महत्व दिया और खड़े कर दिए र्ईट-पत्थरों और सीमेंट कंक्रीट के डिब्बे। सीमेंट – कंकरीट के जंगलों से ही सुकून प्राप्त होता तो हजारों मील दूर से देशी-विदेशी पर्यटक यहां नहीं आते, हमारी अपनी बस्तियों में भी वही सब कुछ तो है जो हम बेणेश्वर में कर रहे हैं।
कहां अन्तर रह गया है बेणेश्वर और हमारी बस्तियों में। हम हर जगह अपनी चलाना चाहते हैं, प्रकृति और परमेश्वर की सुनना हमने बंद कर दिया है। हम सब चाहते हैं कि जहां-जहां हमारे पांव पड़ें, वहां-वहां हमारे या अपने समाज-समुदाय या संगठन-समूह के नाम से जमीन हो जाए ताकि तीर्थ और मेलों को भुनाया जा सके। इनके जरिये प्रतिष्ठा या पैसा बनाया जा सके।
हम एक द्वीप को नहीं छोड़ सकते अपनी भौतिक ऎषणाओं का साम्राज्य दर्शाने, फिर हम कहां के आस्थावादी और सनातनी हैं, जबकि हममें प्रकृति के सनातन स्वरूप को बरकरार रखने का माद्दा ही नहीं बचा।
लाखों लोग हर साल आते हैं, कम से कम एक-एक पेड़ भी लगा दें तो बेणेश्वर टापू दुनिया के अद्वितीय टापुओं में अग्रणी पहचान बना सकता है। और यही नहीं तो विश्व के अजूबों में भी स्थान पा सकता है।
अपने या समाजों के नाम को न रोएं, बेणेश्वर सबका है, सबके लिए है, इस भावना से पहल करें हरित क्रांति का द्वीप बनाएं, यही बेणेश्वर चाहता है।
