लखनऊ (निशांत सक्सेना)अगर किसी शहर में लगातार 100 दिनों तक तापमान रिकॉर्ड स्तर पर बना रहे, तो हम इसे बड़ी खबर मानेंगे। लेकिन यही बात जब महासागर के साथ होती है, तो उसका असर हमारी नजर से काफी हद तक बाहर रहता है।
2026 में दुनिया के महासागर कुछ ऐसी ही असाधारण गर्मी से गुजर रहे हैं। उपलब्ध दैनिक समुद्री सतह तापमान आंकड़ों के मुताबिक, 2 जून से वैश्विक समुद्री सतह का तापमान, ध्रुवीय इलाकों को छोड़कर, साल के इस समय के लिए रिकॉर्ड स्तरों पर बना हुआ है। यह स्थिति 10 सितंबर तक जारी रहती है तो करीब 100 दिनों तक रिकॉर्ड समुद्री गर्मी का दौर बन सकता है।
23 अगस्त को वैश्विक दैनिक समुद्री सतह तापमान 21.24 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का प्रारंभिक आंकड़ा सामने आया। यह मार्च 2024 के 21.17 डिग्री सेल्सियस के पिछले दैनिक रिकॉर्ड से ऊपर है। हालांकि 23 अगस्त के आंकड़े की अंतिम पुष्टि अभी बाकी है।
क्लाइमेट सेंट्रल के जलवायु वैज्ञानिक डॉ. जैकरी लेब के मुताबिक, 2026 में समुद्री गर्मी के रिकॉर्ड जिस तरह टूट रहे हैं, उनके पीछे मानवजनित जलवायु परिवर्तन की बड़ी भूमिका है। उनका कहना है कि इसका असर चरम मौसम से लेकर समुद्री पारिस्थितिकी और तटीय समुदायों की अर्थव्यवस्था तक दिखाई देता है।
यहीं से इस कहानी का असली सवाल शुरू होता है।
अगर समुद्र गर्म हो रहा है, तो इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
समुद्र का तापमान, जमीन की अर्थव्यवस्था
महासागर पृथ्वी की अतिरिक्त गर्मी का सबसे बड़ा भंडार है। अनुमान है कि मानव गतिविधियों से पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का करीब 93 फीसदी हिस्सा समुद्र ने सोखा है।
लेकिन समुद्र की यह भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, उसकी कीमत भी है। गर्म होता समुद्र समुद्री जीवों के आवास और उनके व्यवहार को बदल सकता है। मछलियां अपने अनुकूल तापमान वाले पानी की तरफ जाने लगती हैं। कुछ प्रजातियों के प्रजनन और भोजन चक्र प्रभावित होते हैं। समुद्री हीटवेव लंबे समय तक बनी रहे तो मछली पकड़ने, जलीय कृषि और पर्यटन पर भी असर पड़ सकता है।
डॉ. कैथरीन स्मिथ, मरीन बायोलॉजिकल एसोसिएशन, यूके, के मुताबिक समुद्री गर्मी के दौरान मछलियां ठंडे पानी की तरफ चली जाती हैं या बीमारी और मृत्यु के कारण मत्स्य क्षेत्र बंद करने पड़ सकते हैं। इसका असर तटीय समुदायों पर लाखों से अरबों डॉलर तक पड़ सकता है और अंततः खाद्य कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
भारत जैसे देश के लिए यह कोई दूर की कहानी नहीं है।
देश की लंबी तटरेखा और लाखों लोगों की समुद्र से जुड़ी आजीविका को देखते हुए, समुद्री तापमान में बदलाव का मतलब मछली पकड़ने के इलाके बदलना, पकड़ कम होना, ईंधन खर्च बढ़ना और आय में अनिश्चितता भी हो सकता है।
और जब मछली की उपलब्धता बदलती है, तो असर सिर्फ मछुआरे तक नहीं रहता। वह बाजार और उपभोक्ता की थाली तक पहुंचता है।
पेरू से मिलने वाला संकेत
इस बदलाव की एक झलक 2026 में पेरू में दिखाई दी है।
अल नीनो कोस्टेरो और समुद्री परिस्थितियों के बीच एंकोवी मछली पकड़ने पर गंभीर असर पड़ा। पहली मछली पकड़ने की अवधि में उत्पादन करीब 0.5 मिलियन टन रहा, जबकि पिछले साल यह लगभग 1.9 मिलियन टन था। मछली पकड़ने से जुड़े विनिर्माण क्षेत्र पर भी इसका असर पड़ा।
यहां सावधानी जरूरी है। किसी खास साल में मछली उत्पादन में गिरावट को केवल समुद्री गर्मी के खाते में डालना सही नहीं होगा। ओवरफिशिंग, प्रदूषण, ईंधन की लागत और प्रबंधन संबंधी फैसले भी भूमिका निभाते हैं।
लेकिन जब समुद्र का तापमान बदलता है, तो इन सभी दबावों के ऊपर एक नया जलवायु जोखिम जुड़ जाता है।
यही बात ग्लोबल साउथ के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, जहां समुद्री संसाधनों पर निर्भर समुदायों के पास बदलती परिस्थितियों से बचने के विकल्प अक्सर सीमित होते हैं।
कोरल की सफेदी के पीछे छिपी अर्थव्यवस्था
समुद्री गर्मी का सबसे स्पष्ट असर कोरल रीफ पर दिखाई देता है।
कोरल लंबे समय तक सामान्य से ज्यादा गर्म पानी में रहने पर अपने साथ रहने वाले सूक्ष्म शैवालों को बाहर निकाल सकते हैं। यही प्रक्रिया कोरल ब्लीचिंग कहलाती है। गर्मी लंबे समय तक बनी रहे तो कोरल की मृत्यु भी हो सकती है।
फ्रेंच पोलिनेशिया में कोरल रीफ पर काम कर रहे सीएनआरएस के रिसर्च डायरेक्टर प्रोफेसर सर्ज प्लानेस कहते हैं कि समुद्री हीटवेव अब अलग-अलग जगहों पर होने वाली छिटपुट घटनाएं नहीं रह गई हैं। उनके मुताबिक ये घटनाएं अधिक बार हो रही हैं, ज्यादा तीव्र हो रही हैं और लंबे समय तक चल रही हैं।
स्थानीय स्तर पर प्रदूषण और ओवरफिशिंग कम करके रीफ को मजबूत बनाया जा सकता है। लेकिन प्लानेस के मुताबिक, इससे लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान की भरपाई नहीं की जा सकती।
यह बात भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अंडमान-निकोबार से लेकर लक्षद्वीप और गुजरात के तट तक कोरल रीफ केवल जैव विविधता का हिस्सा नहीं हैं। वे मछलियों के आवास, पर्यटन और तटीय समुदायों की अर्थव्यवस्था से भी जुड़े हैं।
इसलिए कोरल का नुकसान समुद्र के भीतर होने वाली क्षति भर नहीं है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसान है।
जब समुद्र का तापमान बिजलीघर तक पहुंच जाए
समुद्री गर्मी का एक कम चर्चित असर ऊर्जा ढांचे पर भी पड़ सकता है।
तटीय बिजली संयंत्रों और दूसरे औद्योगिक प्रतिष्ठानों को ठंडा करने के लिए पानी की जरूरत होती है। जब समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो, तो कूलिंग सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
2026 में उत्तरी फ्रांस में जेलीफिश के बड़े झुंड के कारण तीन परमाणु रिएक्टरों को बंद करना पड़ा। जेलीफिश ने उन पंपों को प्रभावित किया जिनसे संयंत्र की इकाइयों को ठंडा करने के लिए पानी लिया जाता था।
यह घटना सीधे जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह बताती है कि समुद्र में बदलाव का असर उन प्रणालियों तक पहुंच सकता है जिन्हें आमतौर पर जलवायु नीति की चर्चा में समुद्र से अलग माना जाता है।
ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री पारिस्थितिकी, दोनों एक ही व्यवस्था के हिस्से हैं।
अल नीनो है, लेकिन कहानी सिर्फ अल नीनो की नहीं
2026 की रिकॉर्ड समुद्री गर्मी में अल नीनो की भूमिका महत्वपूर्ण है।
प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में इस साल समुद्री तापमान रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंचा है। अल नीनो समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा के वितरण को बदलता है और दुनिया के कई हिस्सों के मौसम को प्रभावित करता है।
लेकिन अल नीनो को पूरी कहानी मानना भी गलत होगा। मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण महासागर लंबे समय से गर्म हो रहे हैं। ऐसे में प्राकृतिक जलवायु घटनाएं जिस समुद्र में घटित हो रही हैं, वह पहले ही ऐतिहासिक औसत से ज्यादा गर्म है।
यही वजह है कि 2023-24 के अल नीनो के बाद भी समुद्र का तापमान पुराने स्तरों पर तुरंत वापस नहीं लौटा। बाद की ला नीना परिस्थितियों के दौरान भी समुद्र का तापमान ऐतिहासिक संदर्भ की तुलना में असामान्य रूप से ऊंचा बना रहा।
डॉ. लेब के शब्दों में, मौजूदा गर्मी को समझने के लिए अल नीनो और दीर्घकालिक मानवजनित गर्मी, दोनों को साथ देखना होगा।
अब बात पर्यावरण मंत्री की नहीं, वित्त मंत्री की भी है
वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के ओशन प्रोग्राम के ग्लोबल डायरेक्टर डॉ. टॉम पिकरेल का सवाल इसी जगह महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके मुताबिक, रिकॉर्ड समुद्री गर्मी को लेकर चिंता केवल पर्यावरण मंत्रियों की नहीं, वित्त मंत्रियों की भी होनी चाहिए।
क्यों?
क्योंकि समुद्र की गर्मी का असर सरकारी बजट और स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
मत्स्य पालन से आय घट सकती है। खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं। तटीय पर्यटन को नुकसान हो सकता है। जलीय कृषि को बीमारी और तापमान के झटके झेलने पड़ सकते हैं। बंदरगाह और तटीय बुनियादी ढांचे पर जोखिम बढ़ सकता है।
भारत और ग्लोबल साउथ के लिए यह सवाल और गंभीर है। जिन समुदायों की आय समुद्र पर सबसे ज्यादा निर्भर है, उनके पास जलवायु जोखिम से बचने के संसाधन अक्सर सबसे कम हैं।
इसलिए समुद्री गर्मी का संकट असमानता का संकट भी बन सकता है।
महासागर की गर्मी का मतलब भारत के लिए क्या?
भारत में समुद्र की निगरानी को सिर्फ समुद्री विज्ञान की जरूरत मानना अब पर्याप्त नहीं होगा।
समुद्री तापमान और हीटवेव के आंकड़ों को मत्स्य प्रबंधन, तटीय आपदा तैयारी, बंदरगाह योजना, समुद्री पर्यटन और जलीय कृषि की नीतियों से जोड़ना होगा। मछुआरों के लिए शुरुआती चेतावनी सिर्फ तूफान की नहीं, उन समुद्री परिस्थितियों की भी होनी चाहिए जो उनकी पकड़ और आजीविका को प्रभावित कर सकती हैं।
कोरल रीफ और मैंग्रोव को संरक्षण परियोजना भर मानने के बजाय उन्हें तटीय सुरक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी संपत्ति की तरह देखना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण, जलवायु अनुकूलन की चर्चा में समुद्र को वह जगह देनी होगी जो जमीन और हवा को मिलती रही है।
क्योंकि भारत में समुद्र की गर्मी का असर किसी दूर बैठे वैज्ञानिक के ग्राफ में ही नहीं रहेगा।
वह मछुआरे की नाव में दिख सकता है। मछली बाजार की कीमत में दिख सकता है। तटीय पर्यटन की कमाई में दिख सकता है।
और किसी बंदरगाह या बिजली संयंत्र की परिचालन लागत में भी।
2026 में करीब 100 दिनों तक रिकॉर्ड समुद्री गर्मी का संभावित आंकड़ा इसलिए सिर्फ एक नया जलवायु रिकॉर्ड नहीं है। यह एक आर्थिक संकेत भी है।
समुद्र हमें बता रहा है कि जलवायु संकट की कीमत अब सिर्फ तापमान में नहीं मापी जाएगी। उसकी कीमत भोजन, रोजगार, ऊर्जा, पर्यटन और तटीय अर्थव्यवस्था में भी दिखाई देगी।
