बिजली के लिए घटी मांग, उत्पादन और आयात की बदली तस्वीर
लखनऊ (निशांत सक्सेना) भारत का कोयला बाजार अभी एक अजीब मोड़ पर खड़ा है। मांग बढ़ रही है, उत्पादन का रिकॉर्ड बन रहा है, और साथ ही आयात लगातार घट रहा है। आईईए की कोल मिड-ईयर अपडेट 2026 रिपोर्ट में यह पूरी कहानी विस्तार से सामने आई है।
बात 2025 से शुरू करते हैं। उस साल एक ऐसी घटना हुई जो पचास बरस में नहीं हुई थी। भारत में कोयले से बनने वाली बिजली घट गई। वजह थी असमय आया और असामान्य रूप से तेज मानसून। बारिश जल्दी और भरपूर हुई, तो हाइड्रोपावर का उत्पादन बढ़ा और ठंडक के लिए बिजली की जरूरत कम हो गई। खेती और घरेलू उपयोग में भी बिजली की मांग नरम पड़ी। नतीजा यह रहा कि भारत का कुल कोयला खपत एक फीसदी घटकर 1299 मिलियन टन पर आ गया। लेकिन उद्योग जगत में तस्वीर उलट थी, वहां कोयले की खपत बढ़ती रही।
उत्पादन के मोर्चे पर 2025 में भारत लगातार दूसरे साल करीब 1.1 अरब टन पर टिका रहा। कोल इंडिया लिमिटेड, जो देश के कुल उत्पादन का करीब तीन चौथाई हिस्सा संभालती है, वह इसकी रीढ़ बनी रही। साथ ही कैप्टिव और कमर्शियल खदानों का योगदान भी बढ़ता गया।
अब 2026 की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग और एक तगड़े अल नीनो ने मिलकर हालात पलट दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कोयला मांग अपने पुराने बढ़ने वाले रुख पर लौट रही है और इस साल करीब 4.2 फीसदी बढ़कर 1353 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। बिजली की बढ़ती मांग इसकी सबसे बड़ी वजह है, भले ही सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ रही हो। अल नीनो का असर भी साफ दिखेगा, गर्मी ज्यादा पड़ेगी, ठंडक की जरूरत बढ़ेगी और हाइड्रोपावर उत्पादन कमजोर पड़ेगा। इससे कोयले पर निर्भरता फिर बढ़ जाएगी।
औद्योगिक मांग की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। पिग आयरन, डायरेक्ट रिडक्शन ऑफ आयरन यानी डीआरआई, और सीमेंट, ये तीनों भारत में कोयले के सबसे बड़े औद्योगिक उपभोक्ता हैं और तीनों में मजबूत मांग बनी हुई है। स्टील की खपत बढ़ने के साथ पिग आयरन का उत्पादन बढ़ रहा है, और इसका बड़ा हिस्सा ब्लास्ट फर्नेस बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस यानी बीएफ-बीओएफ रूट से आता है, जो कोकिंग कोल पर निर्भर है। यही वजह है कि मेटलर्जिकल कोयले की मांग बढ़ाने में भारत की भूमिका सबसे आगे है, जबकि चीन में इस कोयले की मांग हल्की गिरावट की तरफ है।
उत्पादन के मामले में भारत के लिए 2026 का साल एक नया रिकॉर्ड लेकर आ सकता है, रिपोर्ट में यह आंकड़ा 1095 मिलियन टन के आसपास बताया गया है। लेकिन यहां एक पेच है। पिटहेड पर कोयले का भंडार इतना भर चुका है कि कोल इंडिया की उत्पादन रफ्तार पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। मई में कंपनी का उत्पादन आंकड़ा कमजोर रहा, क्योंकि स्टॉक पहले से ही ऊंचा था। कंपनी अब मौजूदा मांग को गोदाम से निकालकर पूरा कर रही है, नया उत्पादन बढ़ाने की जल्दी नहीं दिखा रही। इसके उलट कैप्टिव और निजी खदानें अपनी क्षमता का विस्तार जारी रखे हुए हैं।
यहीं से आयात की कहानी शुरू होती है, और यह भारत के लिए सबसे बड़ा बदलाव है। थर्मल कोयले का आयात लगातार घट रहा है, खासकर बिजली संयंत्रों की तरफ से। सरकार ने रिकॉर्ड मात्रा में घरेलू कोयले की नीलामी की है, ताकि आयातित कोयले की जगह देसी कोयला ले सके। यह सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की स्पष्ट रणनीति है। रिपोर्ट के अनुसार भारत का समुद्री थर्मल कोयला आयात 2026 में घटकर करीब 160 मिलियन टन रह जाएगा, जो 2025 में 167 मिलियन टन था। भारत और यूरोप, ये दोनों ही अब दुनिया में समुद्री थर्मल कोयले की घटती मांग के मुख्य केंद्र बन गए हैं। जहां बाकी दुनिया में कोयला आयात नई राहें तलाश रहा है, भारत उससे दूरी बना रहा है।
लेकिन मेटलर्जिकल कोयले की कहानी अलग है। भारत के पास उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोल का घरेलू भंडार सीमित है, इसलिए स्टील उत्पादन बढ़ने के साथ इसका आयात बढ़ता रहेगा। रिपोर्ट बताती है कि 2026 में मेटलर्जिकल कोयले की समुद्री मांग बढ़ने में भारत और इंडोनेशिया की भूमिका सबसे अहम होगी।
2027 की तरफ देखें तो भारत की कहानी आगे भी बढ़त की रहेगी। रिपोर्ट के मुताबिक भारत कोयला उत्पादन में एक और रिकॉर्ड बनाएगा, और इसमें कैप्टिव तथा कमर्शियल खदानों का योगदान और बढ़ेगा, जबकि कोल इंडिया अपनी मौजूदा मांग और भंडार के हिसाब से उत्पादन को संतुलित रखेगी। बिजली की बढ़ती मांग और औद्योगिक गतिविधि, दोनों मिलकर भारत को दुनिया में कोयला मांग वृद्धि का एक बड़ा स्रोत बनाए रखेंगे। थर्मल कोयले का आयात स्थिर रहने की उम्मीद है, क्योंकि औद्योगिक मांग बिजली क्षेत्र की घटती आयात जरूरत की भरपाई कर देगी। वहीं स्टील क्षेत्र के विस्तार के चलते मेटलर्जिकल कोयले का आयात मजबूत बना रहेगा, और इसका सबसे बड़ा फायदा ऑस्ट्रेलिया को मिलने की संभावना है।
कुल मिलाकर भारत की कोयला कहानी अब दो अलग रास्तों पर बंट गई है। एक तरफ थर्मल कोयले में आत्मनिर्भरता की तरफ मजबूत कदम, दूसरी तरफ स्टील उद्योग की भूख के चलते कोकिंग कोल पर बनी हुई निर्भरता। मौसम, भूराजनीति और घरेलू नीति, तीनों मिलकर इस संतुलन को आगे भी हिलाते रहेंगे।
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