• August 20, 2025

क्या न्यायालय यह कह सकता है कि मैं कलम और कागज लेकर संविधान का पुनर्लेखन करूँ ?”

क्या न्यायालय यह कह सकता है कि मैं कलम और कागज लेकर संविधान का पुनर्लेखन करूँ ?”

सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपालों और अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों से संबंधित राष्ट्रपति संदर्भ में दलीलें सुनीं। भारत के अटॉर्नी जनरल (एजी) आर. वेंकटरमणी ने सवाल उठाया कि क्या न्यायपालिका विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय-सीमा निर्धारित करके प्रभावी रूप से “संविधान का पुनर्लेखन” कर सकती है।

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ के समक्ष बहस करते हुए यह तीखा सवाल उठाया, जिसमें न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति  नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर शामिल थे।

पीठ ने कहा, “क्या न्यायालय इस हद तक जा सकता है कि वह कहे कि मैं कलम और कागज लेकर संविधान का पुनर्लेखन करूँ ?”

यह मामला तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल एवं अन्य मामले में न्यायालय के फैसले से उपजा है, जहाँ न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने कहा था कि विधेयकों पर राज्यपालों द्वारा अनिश्चितकालीन निष्क्रियता अस्वीकार्य है, और ऐसी निष्क्रियता न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

संविधान का अनुच्छेद 200 कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं करता, फिर भी न्यायालय ने निर्णय दिया था कि राज्यपालों को “उचित समय-सीमा” के भीतर कार्य करना होगा।

इसी प्रकार, न्यायालय ने निर्देश दिया कि अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति की स्वीकृति सामान्यतः तीन महीने के भीतर प्रदान की जानी चाहिए, जिसमें किसी भी देरी के कारण दर्ज किए जाने चाहिए।

अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि ने तर्क दिया कि समय-सीमाएँ निर्धारित करके, सर्वोच्च न्यायालय ने विधायी क्षेत्र में प्रवेश किया है और राष्ट्रपति को एक “सामान्य वैधानिक प्राधिकारी” माना है।

उन्होंने तर्क दिया कि नए प्रक्रियात्मक आदेश बनाने के लिए न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 142 पर निर्भरता “संवैधानिक विधानों की अनदेखी करके एक नया ढाँचा बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं की जा सकती।”

उन्होंने आगे सवाल किया कि क्या अनुच्छेद 143 के अंतर्गत सलाहकार क्षेत्राधिकार न्यायालय को ऐसे प्रश्नों पर निर्णय देने की अनुमति देता है जैसे कि क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल के कार्यों की न्यायिक समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।

न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने उत्तर दिया, “आप सलाहकार क्षेत्राधिकार में यह नहीं पूछ सकते… आप हमसे एक राय माँग रहे हैं और राय बहुपक्षीय हो सकती है।”

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ज़ोर देकर कहा कि “सभी समस्याओं का समाधान अदालत में नहीं हो सकता।”

उन्होंने पीठ से अनुच्छेद 74, 111, 155, 163, 200 और 201 के तहत व्यापक संवैधानिक व्यवस्था पर विचार करने का आग्रह किया, साथ ही यह भी कहा कि संविधान सभा ने सहमति के लिए समय-सीमा निर्धारित करने के अपने पहले के प्रस्ताव को जानबूझकर हटा दिया था।

उन्होंने कहा, “इसे उचित कारणों से हटाया गया था क्योंकि यह शक्ति सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारी को सौंपी गई थी।”

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने कहा कि तमिलनाडु मामले में एक “गंभीर स्थिति” थी जहाँ विधेयक राज्यपाल के समक्ष अनुचित रूप से लंबे समय से लंबित थे, जिसके कारण न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक था।

उन्होंने कहा, “देखिए, यह कितनी गंभीर स्थिति थी… इस स्थिति को सुधारने के लिए ही अदालत ने हस्तक्षेप किया।” मुख्य न्यायाधीश गवई ने अनुच्छेद 143 के संदर्भों के दायरे पर भी टिप्पणी की, और कहा, “तो आप कह रहे हैं कि सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि कोई ठोस संवैधानिक प्रश्न है या नहीं। अगर ऐसा है, तो सोमवार और शुक्रवार… हमारे पास आने वाले मामलों की संख्या…”

पीठ ने कहा, “क्या न्यायालय यह कह सकता है कि मैं कलम और कागज लेकर संविधान का पुनर्लेखन करूँ ?”

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