संयुक्त राष्ट्र कठपुतली है

संयुक्त राष्ट्र कठपुतली है

अरुण तिवारी —- धृत राष्ट्र और संयुक्त राष्ट्र में दो कॉमन बातें हैं। पहली ये कि दोनों के नाम में राष्ट्र है और दूसरी, दोनों का कैरेक्टर हर दर्जे का पक्षपाती रहा है। संयुक्त राष्ट्र में एक एक्स्ट्रा टैलेंट ये है कि उसके कर्मचारी पॉटी करके भी किसी देश के हजारों लोगों को मार सकते हैं। हैजा फैला सकते हैं।

हैजा हैती में फैला था। घटना 2010 की है। UN के शांति सैनिकों के शिविर से अपशिष्ट निपटान के दौरान हैती की एक प्रमुख नदी आर्टिबोनाइट दूषित हो गई थी।

10,000 लोगों की मौत हुई और 8,00,000 से अधिक लोग प्रभावित हुए। मरने वालों की वास्तविक संख्या 30,000 तक होने का अनुमान जताया गया।

संयुक्त राष्ट्र ने माफी मांगी,  किया-धरा कुछ नहीं।

दरअसल धूर्तता के धरती में अनंत उदाहरण हैं लेकिन मेरी नजर में संयुक्त राष्ट्र से बेहतर कोई नहीं। भारत द्वारा 43 रोहिंग्या लोगों को समुद्र में धकेलने की कथित घटना पर संयुक्त राष्ट्र ने एक जांच कमेटी बना दी है। ठीक है। जांच करिए। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ टॉम एंड्रयूज ने 15 मई 2025 को इसकी जांच शुरू की, इसे ‘अस्वीकार्य और अमानवीय’ करार देते हुए भारत सरकार से जवाबदेही की मांग की। लेकिन क्या सारी जवाबदेही का ठीकरा भारत के सिर पर है?

महरंग बलोच चिल्ला रही है कि तीन साल के बच्चों तक की हत्या पाकिस्तान कर रहा है। उस पर जवाबदेही कैसे तय होगी? जांच भी करते हैं तो उसके बाद मुंह पर टेप लगा लेते हैं संयुक्त राष्ट्र वाले। बलोचिस्तान वो जगह है जहां पाकिस्तान की बर्बर सेना ने सामूहिक कब्रें तैयार की हैं।

जनवरी 2014 में बलोचिस्तान के खुजदार जिले के तूतक इलाके में एक सामूहिक कब्र से 150 शव निकाले गए। बलोच कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि ये शव उन युवाओं के थे, जिन्हें पाकिस्तानी सेना ने जबरन गायब कर मार डाला और फिर दफना दिया।

इन शवों को मारने से पहले गंभीर यातनाएं दी गई थीं, जो बलोचों के खिलाफ “मारो और फेंक डालो” (Kill and Dump) नीति का हिस्सा माना जाता है। बलोच समुदाय का कहना है कि यह एथनिक क्लिंजिंग का अभियान है, जिसका मकसद उनकी आवाज को दबाना है।

संयुक्त राष्ट्र के कानों में जूं नहीं रेंग रही है। बलोचिस्तान जलता है तो जलने दो।

(फेसबुक साभार)

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