• February 22, 2016

अजब-गजब हैं बेणेश्वर की मेला परम्पराएं – डॉ. दीपक आचार्य

अजब-गजब हैं बेणेश्वर की मेला परम्पराएं  – डॉ. दीपक आचार्य

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भूतभविष्य और वर्तमान की पीढ़ियों के लिए किसी न किसी रूप में ख़ास महत्व रखने वाला बेणेश्वर और इसकी परम्पराएं भी मनोहारी हैं। संत मावजी महाराज एवं बेणेश्वर की पुरातन धार्मिक परम्पराओं में कई वैज्ञानिक रहस्य समाहित हैं। इन परम्पराओं के पीछे चमत्कार और दैवीय शक्तियों की ऊर्जा पग-पग पर देखने को मिलती है।

       जब आबूदर्रा से उधार लिया शुद्ध घी

सन् 1958 में बड़लिया महाराज के नाम से मशहूर संत भोलानाथ ने बेणेश्वर धाम पर सुवृष्टि के लिए इन्द्र यज्ञ किया। इसका आचार्यत्व किया पं. भवानीशंकर भट्ट ने। तब हवन के लिए शुद्ध घी कम पड़ गया। ऎसे में बड़लिया महाराज ने आबूदर्रा संगम तीर्थ में से कई डिब्बे भर कर लाने को कहा। जब यज्ञ मण्डप में इन डिब्बों को देखा गया तो इनमें शुद्ध घी भरा था। यज्ञ पूर्ण हो जाने के बाद में शुद्ध घी मंगवा कर आबूदर्रा को वापस सौंपा गया। बेणेश्वर के अष्टम पीठाधीश्वर महन्त देवानन्द जी महाराज ने 21 मई 1964 को यहां पंचकुण्डी यज्ञ करवाया था।

       कटारा क्षेत्र

वागड़ के जिस भू भाग को माही, सोम और जाखम नदियों ने कटार के समान काटा, उससे यह कटारा उप प्रदेश बन गया।

       सोम देती है अमृत

Beneshwar 220116 (10)लोक मान्यता है कि बेणेश्वर त्रिवेणी संगम से जुड़ी नदी सोम यदि पहले पूर्ण प्रवाह के साथ बहे तो उस वर्ष साल(चावल) की फसल अच्छी पकती है। जबकि माही में जल प्रवाह पहले होने पर समय ठीेक नहीं माना जाता।

       भगवान को लगता है अलग-अलग भोग

बेणेश्वर महामेले के सभी दसों दिनों में भगवान को अलग-अलग भोग लगता है।

माघ शुक्ल पूर्णिमा – शीरा

माघ कृष्ण प्रतिपदा – दाल-बाटी

द्वितीया – दाल-बाटी

तृतीया – पूड़ी-शीरा

चतुर्थी – दाल-रोटी

पंचमी – मोदक, दाल-बाटी

       आदिवासी पुजारी को ही है अधिकार पूजा का

राधा-कृष्ण मन्दिर पर सोने-चान्दी के वागे व 24 अवतारों के चित्रांकन युक्त चान्दी के किवाड़ मेले से ठीक एक दिन पहले चतुर्दशी को वहां पहुंचते हैं व इनका उपयोग होता है।  मुख्य मेला पूर्णिमा से पंचमी तक साबला का पुजारी वहां पूजा करता है जबकि राधा-कृष्ण मन्दिर में आम दिनों में आदिवासी पुजारी ही होते हैं।

        विज्ञापनों का मेला होता है बेणेश्वर

विज्ञापन के लिए तलाश होती है भारी भीड़, आंखों को आकर्षित करने वाला स्थल और उपयुक्त समय। वनवासी अंचल के प्रमुख तीर्थ बेणेश्वर धाम पर लगने वाला मेला इन सभी दृष्टियों से फायदेमन्द है। यही वजह है कि बेणेश्वर महामेले में साल-दर-साल विज्ञापनों की बाढ़ आने लगी है।

विदेशियों के लिए बड़ा अजूबा है बेणेश्वर महामेला

बेणेश्वर मेले में हर साल आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए बेणेश्वर का समूचा मेला किसी अजूबे से कम नहीं है। जहां एक ही दिन में लाख से अधिक श्रद्धालुआें का अपने पितरों के प्रति आस्था अभिव्यक्त करने का सामूहिक दृश्य और इससे जुड़े अनुष्ठानों की रोचक श्रृंखला इन्हें मोहित और विस्मित किए बगैर नहीं रहती।

       उत्सवी परम्परा है रास लीला

संत मावजी महाराज प्रणीत निष्कलंक सम्प्रदाय में कृष्ण भक्ति धाराओं की स्रोतस्विनी के रूप में सदियों से बह रही रास लीला की ख़ास महिमा रही है।  यों तो वर्ष भर अनेक अवसरों पर रास लीला व साद भक्तों की भक्तिगान परम्परा विद्यमान रही है किन्तु विशेष अवसरों पर वागड़ अंचल (बांसवाड़ा और डूंगरपुर) में अनेक स्थानों पर रासलीला के भव्य आयोजन होते हैं। पूर्णिमा को डूंगरपुर चोखला वालों को रास का अधिकार है। एकम को साबला चोखला वाले रास करते हैं।

रास  कब कहाँ ?

चैत्र पूर्णिमा     बोरवट हनुमान मन्दिर (बांसवाड़ा जिला )
वैशाख पूर्णिमा   हरि मन्दिर साबला(डूंगरपुर जिला )
आषाढ़ पूर्णिमा(गुरु पूर्णिमा) हरि मन्दिरसाबला (डूंगरपुर जिला )
श्रावण पूर्णिमा(रक्षा बंधन) बेणेश्वर धाम
जन्माष्टमी हरि मन्दिरसाबला
भाद्रपद पूर्णिमा   बेणेश्वर धाम
आश्विन पूर्णिमा  शेषपुरसलूम्बर(उदयपुर जिला)
कार्तिक  पूर्णिमा(देव दीवाली) बेणेश्वर धाम
पौष पूर्णिमा      बेणेश्वर धाम (पदयात्रा महोत्सव)

विट्ठलदेव धाम(बांसवाड़ा जिला)

माघ पूर्णिमा से पंचमी    बेणेश्वर धाम(मावजी जन्मोत्सव मेले में)

                            मावजी महाराज के प्रमुख लीला स्थल

साबला जन्म स्थलगुरु ग्रंथ आगमवाणी चौपड़ाजी
बेणेश्वर धाम रास लीला स्थली
शेषपुर निर्वाण स्थलीचौपड़ाजी
जूनी शाहवाड़ी (अहमदाबाद ) समाधि स्थल
पुंजपुर चौपड़ाजी

बेणेश्वर पीठाधीश्वर(गुरुगादी) परम्परा

क्रम

पीठाधीश्वर

पूर्वाश्रम का स्थल

(संवत)

(सन्)

1.

मावजी महाराज

साबला(डूंगरपुर)

1771-1801

1714 -1744

2.

श्री उदियानन्दजी

साबला(डूंगरपुर)

1801-1830

1744 -1773

3.

जनकुँवरी(जनपुरुष)

पानगामड़ा, (उदयपुर)

1830-1912

1773-1855

4.

श्री शिवानन्दजी

लीलावासा(बांसवाड़ा)

1912-1929

1855-1872

5.

श्री पूर्णानन्दजी

रोहिड़ा(बांसवाड़ा)

1929-1945

1872-1888

6.

श्री कमलानन्दजी

पालोदा(बांसवाड़ा)

1945-1985

1888-1928

7.

श्री परमानन्दजी

नागदला नागदा(बांसवाड़ा)

1985-2001

1928-1944

8.

श्री देवानन्दजी

सरोदा(डूंगरपुर)

2001-2046

1944 से 31 अक्टूबर1989

9.

श्री अच्युतानन्दजी

सरोदा(डूंगरपुर)

2046 से

11 नवम्बर 1989 से

 आदूदर्रा … जहां धन उधार मिलता था….

बेणेश्वर धाम पर वाल्मीकि मन्दिर के पीछे नदी में चट्टानों से निर्मित टंकी नुमा स्थान है जिसमें पानी भरा रहता है। इसे आदूदर्रा के नाम से जाना जाता है। यहीं एक धूंणी भी है।

इस स्थान के बारे में मान्यता है कि कुछ दशकों पहले यहां शाम के वक्त पहुंच कर याचना करने पर अगले दिन वांछित धन मिल जाता था। बाद में से इसे कहे हुए समय के अनुसार वापस लौटाने की परंपरा थी। यहीं पर धार्मिक स्थल व छोटी गुफा भी बताते हैं।

       मेले में भोज पीठाधीश्वर की ओर से

बेणेश्वर महामेले में प्रथम दिवस पर ग्यारस को हरि मन्दिर एवं बेणेश्वर दोनों ही स्थानों पर महन्त/पीठ की ओर से भोज दिया जाता है। इस दिन बेणेश्वर में सभी मन्दिरों में पीठ की ओर से भोग की परम्परा बनी हुई है। इस दिन कोटवाल, साद आदि सभी अनन्य भक्तों को महन्त द्वारा दक्षिणा भी दी जाती है।

ख़ास धाम है एटीवाला पाड़ला

एटीवाला पाड़ला निष्कलंक सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ है। यहां भगवान निष्कलंक की एक शताब्दी से भी ज्यादा पुरानी धूंणी है। इस स्थानक पर पालकी है। यहां हर नवरात्रि, आषाढ़ आदि में हवन होता है। इन्द्र यज्ञ भी होता है। इन धामों पर बीज, पूनम एवं एकादशी आदि पर सत्संग होता है। व्रत भी रखते हैं। यहां से हर वर्ष मेले मेें देवापुरी महाराज की परंपरा में पालकी आती है जो मेला होने तक वाल्मीकि मन्दिर में रहती है जहां भगतों द्वारा भजन-कीर्तन और हवन का दौर बना रहता है।

       बहुतों की रजत जयन्ती मन चुकी है

बेणेश्वर महामेला कई शासकीय नुमाइन्दों के लिए अपने जीवन का अंग बन चुका है। हर बार बेणेश्वर महामेले में कई राज्यकर्मी ऎसे मिलेंगे जिन्हें मेले की गतिविधियों में हिस्सा बंटाते झाई-तीन दशक से भी ज्यादा वर्ष बीत चुके हैं। कई तो मेले में अपनी भागीदारी की रजत जयन्ती भी मना चुके हैं।

डूंगरपुर के जिला खेल अधिकारी रहे श्री प्रेमचन्द शर्मा पिछले तीन दशकों से अधिक समय तक मेले में खेलकूद प्रतियेागिताओं का आयोजन करा चुके हैं।  सन् 1977 में जब से खेल विभाग ने मेला स्थल पर खेलकूद प्रतियोगिताएं शुरू की हैं तभी से वे हर साल इस मेले में आते व खेल आयोजन करते रहे। शर्मा ने कुछ वर्ष पूर्व हुई मुलाकात में बताया कि पहले मेला बेणेश्वर पहाड़ी तक ही सिमटा हुआ था लेकिन जनसंख्या वृद्धि और मेले की महिमा के विस्तार के चलते आज यह कई किलोमीटर तक फैल चुका है।

श्री शर्मा  का मानना था कि पहले बेणेश्वर महामेले का आनन्द ही कुछ और था। यहां जंगल में मंगल की उक्ति पूरी चरितार्थ होती थी वहीं मेले की मौलिक संस्कृति और वागड़ अंचल की लोक संस्कृति का जीवन्त दिग्दर्शन हुआ करता था लेकिन हाल के वर्षों में इसका स्थान ले लिया है शोरगुल और कृत्रिमता भरी आधुनिक मेला परिपाटियों ने। अब मेले में ग्राम्य संस्कृति और वनवासी जीवन दर्शन से कहीं ज्यादा शहरीकरण और आधुनिकताएं हावी होने लगी हैं।

डूंगरपुर के सूचना एवं जन सम्पर्क कार्यालय के ऑपरेटर रह चुके नत्थूसिंह भी सन् 1978 से लगातार मेले में जन सम्पर्क कार्यालय की प्रदर्शनी के लिए जाते रहे हैं। उनका कुछ वर्ष पूर्व ही देहान्त हो चुका है। ऎसे बहुत से लोग हैं जो तीन दशकों से अधिक समय से मेले में किसी न किसी रूप में हिस्सेदारी अदा करते रहे हैं।

       केसिया लाता है वसन्त

बेणेश्वर मेले में लोक लहरियों का प्रवाह आठ-दस दिन तक बना रहता है। मुख्य मेले के दिन अर्थात् माघ पूर्णिमा को जब मेला पूरे यौवन पर होता है तब की बात की कुछ और होती है। मेले में कटारा क्षेत्र के आदिवासी केसिया गाते हैं-

कुंवारे कांठे पे बैना,

रोमालिया भूली आव्यो हो,

बेणेश्वरियो मेलो रे बैना,

वेली रे जोवा आजे रे…

इसके अलावा विभिन्न अंचलों में आने वाले मेलार्थी आदिवासी वागड़ी एवं फागुनी श्रृंगार गीत गाते थिरकते नज़र आते हैं। ये आदिवासी मेले में घूमर, गैर, वालर आदि अनेक परम्परागत नृत्यों से माहौल को मदमस्त कर देते हैं।

बेणेश्वर मेला और बेणेश्वर तीर्थ, मावजी महाराज और उनकी परम्परा आदि में कई रोचकताएं समाहित हैं। यही वजह है कि मावजी महाराज के लाखों भक्त आज भी उनके उपदेशों और वाणियों में अगाध श्रद्धा भाव रखते हुए उन्हें पूजते रहे हैं।

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