• January 23, 2015

देश को फिर जरूरत है सुभाष बोस की – डॉ. दीपक आचार्य

देश को फिर जरूरत है  सुभाष बोस की  – डॉ. दीपक आचार्य

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नेताजी जैसा विराट शिखर पुरुष सदियों में जन्म लेता है और अपने विलक्षण कर्मयोग के कारण सदियों तक याद किया जाता है। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के प्रति सच्चे और स्वाभिमानी भारतीयों के मन में अपार श्रद्धा हमेशा हिलोरें लेती रही है चाहे उनकी जन्म जयन्ती हो या साल भर का कोई सा दिन।

नेताजी के नाम पर विश्व भर में सुभाषचन्द्र बोस ही एकमात्र ऎसे सर्वप्रिय और श्रद्धेय व्यक्तित्व माने जा सकते हैं जिनके साथ यह नाम वाकई यथार्थ अर्थपरक और श्रद्धेय है वरना आजकल नेताजी शब्द के क्या मायने होते जा रहे हैं इस बारे में समझदार लोग शायद ज्यादा अच्छी तरह जानते-समझते और व्यवहार करते हैं। subhash

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के विराट व्यक्तित्व और असीमित कर्मयोग के बारे में हम सभी लोग खूब सारी बातें करते हैं, आयोजनों के नाम ढोंग करते हैं, दिखावा करते हैं और इतनी सारी श्रद्धा उण्डेल देते हैं कि जैसे यह श्रद्धा हमने बरसों से एक साथ जमा कर रखी हो और किसी के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्त करने का कोई मौका ही न मिला हो।

नेताजी के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्त करने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो नेताजी के वचनों और कार्यों मेंं विश्वास रखता हो, नेताजी के अनुरूप समाज और देश का बनाना चाहता हो। नेताजी के उपदेशों, आचरणों और कर्म में विश्वास रखने वाला इंसान समाज और देश के प्रति वफादार होता है और यह वफादारी मरते दम तक बनाए रखता है। उसे इस बात की कभी परवाह नहीं होती कि समाज या देश से उसे क्या प्राप्त होगा और क्या मिलने वाला है। वह निष्काम कर्मयोग के साथ अपना काम करता है और जो कुछ करता है वह लोक मंगल एवं राष्ट्र मंगल के लिए ही। उसका अपना कुछ नहीं होता।

जिन हालातों में आज हम सभी जा रहे हैं उनमें नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की जरूरत सबसे ज्यादा है। चारों तरफ हाथ पर हाथ धरे बैठे लोगों का हुजूम, हर तरफ बतियाते हुए, बेकार और उत्साहहीन लोगों का जमघट, फालतू की चर्चाओं में मशगूल बडे़-बुजुर्ग, दिशाहीन युवाओं का सैलाब, किंकत्र्तव्यविमूढ़ अवस्था में जी रहे अनगिनत लोगों का जमावड़ा और हर तरफ निकम्मेपन, उदासीनता को ओढ़े हुए आधे-अधूरों और अधमरों का मंजर आदि सब कुछ यही बताता है कि आज नेताजी हमारे सामने होते तो वे किन युवाओं से  देश की आजादी  और विकास के लिए खून मांगते। न वह खून रहा है न जुनून।

खून क्या अब सारा पानी ही बहने लगा है हमारी रगों  में। यह पानी भी ऎसा कि जिसमें जाने कितनी प्रकार की मिलावट है, प्रदूषण और जात-जात की सडांध है। और पानी भी कहाँ रहा है। अब न कहीं पानी ठहरता है, न पानी रुक पा रहा है। चारों तरफ लोग बहते चले जा रहे हैं या बहकते जा रहे हैं। अब कोई ठिकाना नहीं रहा किसी का। न कोई कहीं रुकना चाहता है, न हम रोक पा रहे हैं।

लोग अपने बाड़ों और गलियारों से बाहर भटकते जा रहे हैं और वो भी ऎसे कि खुद को पता नहीं है कि कहाँ जा रहे हैं, कहाँ ले जाये जा रहे हैं। कहीं चाशनी चाटने के लिए हम लपकने लगते

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