- May 5, 2025
बंगाल और बंगालियों का इतिहास…
बंगाल और बंगालियों का इतिहास…
उमाशंकर सिंह ——-मैं उन्हें कायर भी नहीं कहूंगा। लेख पढ़िए, जिन घटनाओं का जिक्र करूंगा, उनकी तथ्यात्मक जांच कीजिए, फिर बताइए…
कायर से भी नीच शब्द क्या होगा, यही मैं इन बंगालियों को कहूंगा।
बख्तियार खिलजी ने 1200 ई. के आसपास बंगाल पर कब्जा कर लिया था। कहा जाता है कि खिलजी के लिए बंगाल जीतना बस घुड़सवारी का मामला था।

मुसलमानों को बंगाल से ज्यादा प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि वहां शांतिपूर्ण माहौल था। बंगाल एक समृद्ध राज्य था, चाहे खेती हो या व्यापार, कोई भी बंगाल का मुकाबला नहीं कर सकता था।
उस समय नवरात्रि के दौरान बंगाल में इतना व्यापार होता था कि मुस्लिम शासन के बाद भी दुर्गा पूजा पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया, इसके विपरीत नवाबों ने मुसलमानों से इसमें भाग लेने को कहा।
उस समय के बंगाल में आज का बिहार, झारखंड, उड़ीसा और बांग्लादेश शामिल थे और यहाँ भाषा की समस्या भी पैदा हो गई क्योंकि सुल्तानों ने बंगाली को राज्य की भाषा के रूप में रखा था। ऐसे में बंगाली भाषियों को सरकारी सुविधाओं पर एकाधिकार मिल गया।
तुर्की मुसलमानों के जाने के बाद बंगाल मुगलों के पास चला गया और अंत में जब महाराष्ट्र में हिंदू मराठा साम्राज्य का उदय हुआ, तब नागपुर के महाराज रघुजी भोसले ने बंगाल को हिंदू स्वराज्य में शामिल करने की कोशिश की।
भोसले ने बंगाल के नवाब अलीवर्दी खान को स्वराज्य में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया, जिसे अलीवर्दी ने अस्वीकार कर दिया।
कटक (उड़ीसा) के राजा ने रघुजी भोसले से मदद माँगना शुरू कर दिया, जिससे रघुजी को मौका मिल गया।
लेकिन पेशवा ने पहले तो रघुजी को मना कर दिया, लेकिन काफी अनुनय-विनय के बाद युद्ध का प्रस्ताव पारित कर दिया। 1742 में नागपुर की सेना ने बंगाल पर हमला किया और बुरी तरह पराजित हुई।
दरअसल, इससे पहले जहाँ भी मराठा सेना ने कार्रवाई की थी, वहाँ स्थानीय हिंदू उनका साथ दे रहे थे। रघुजी भोसले को यहाँ के बंगाली हिंदुओं से भी यही उम्मीद थी। जबकि बंगाल में हिंदुओं की मुस्लिम नवाबों से घनिष्ठता थी। उच्च पदों पर केवल हिंदू ही आसीन थे।
उड़ीसा, बिहार और झारखंड में रघुजी को समर्थन मिल रहा था, लेकिन बंगाल प्रांत में पैर रखते ही जनता ने उन्हें धोखा दिया। जैसे सेना को भटकाना और गुरिल्ला हमले करवाना।
ऐसी स्थिति में रघुजी फिर से हमला करते हैं और आसानी से बिहार और झारखंड को आजाद करा लेते हैं। 1745 में उन्हें फिर से मौका मिलता है और इस बार सेना बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद में प्रवेश करती है।
लेकिन उन्हें खुद हिंदुओं के विरोध का सामना करना पड़ता है, जाते समय क्रोधित रघुजी बंगाल के कई प्रांतों को जला देते हैं। 1747 में वे आखिरी हमला करते हैं और इस बार उनका उद्देश्य बंगालियों को चुन-चुन कर मारना था।
सेना के बंगाल में प्रवेश करते ही वे अपने साथ आए पिंडारियों को खुली छूट दे देते हैं और फिर बंगाल में भयानक नरसंहार होता है। हिंदू हों या मुसलमान, सभी को बेरहमी से मार दिया जाता है।
बिहार, झारखंड को एक संयुक्त राज्य बना दिया जाता है और उड़ीसा अलग हो जाता है। शेष बंगाल के नवाब मराठा वर्चस्व को स्वीकार करते हैं लेकिन इस विभाजन के बाद बंगाल में केवल बंगाली भाषी लोग ही बचे थे।
बंगाली भाषा के इतिहासकारों ने लिखा है कि हिंदू राजा हमें मार रहा था और मुस्लिम राजा ने पैसे देकर हमारी जान बचाई। यह घटना आज तक इस पूरे दंगे की जड़ है।
1757 में जब मराठा पेशावर और लाहौर में अब्दाली से लड़ रहे थे। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर कब्जा कर लिया था।
जब अंग्रेजी सेना कलकत्ता में घुसी तो वह हैरान रह गई। क्योंकि स्थानीय लोग अंग्रेजी सेना पर फूल बरसा रहे थे।
चूंकि अंग्रेजों की मंशा बंगाल को लूटने की थी, इसलिए फूल वर्षा कार्यक्रम के बाद बंगालियों का कत्लेआम हुआ। लेकिन अंग्रेज भी बंगाल के महत्व को समझते थे, उन्होंने कलकत्ता को राजधानी बनाया और वहीं से सत्ता पर कब्जा कर लिया।

