• June 23, 2016

जनसंघ के संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद को नमन :- विधायक नरेश कौशिक

जनसंघ के संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद को  नमन :- विधायक नरेश कौशिक

बहादुरगढ़, 23 जून   भारतीय जन संघ के  संस्थापक डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का गुरुवार को झज्जर रोड स्थित भाजपा  कार्यालय में बलिदान दिवस मनाया गया। स्थानीय विधायक नरेश कौशिक  सहित पार्टी के पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं ने डा.मुखर्जी के चित्र के समक्ष  पुष्पाजंलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।

डा. मुखर्जी के बलिदान दिवस पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में  विधायक कौशिक ने कहा कि भारतीय जन संघ के संस्थापक के रूप में  डा.मुखर्जी ने जो निष्ठापूर्वक पार्टी के प्रति त्याग की भावना दिखाई वह पार्टी  कार्यकर्ताओं के लिए एक आदर्श है। ऐसी महान विभूति को वे नमन करते हैं,  जिन्होंने भारतीय शिक्षाविद्, चिंतक और एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता के रूप में  अपनी पहचान कायम रखी है।
उन्होंने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री पंडित  जवाहर लाल नेहरू के मंत्री मंडल में डा.मुखर्जी उद्योग और आपूर्ति मंत्री रहे  किन्तु वैचारिक मतभेतों के कारण उन्होंने मंत्री मंडल और कांग्रेस से त्याग पत्र  देकर एक नई राजनीतिक पार्टी के रूप में भारतीय जन संघ की स्थापना की।  केन्द्र सरकार में मंत्री बनने से पहले वे पश्चिम बंगाल सरकार में वित्तमंत्री भी  रहे। उन्होंने बताया कि डा.मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ  एक सकारात्मक युग की शुरूआत की।
श्रद्धाजंलि सभा में भाजपा के पूर्व जिला मीडिया प्रभारी दिनेश  शेखावत ने बताया कि डा.मुखर्जी 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के प्रतिष्ठित  परिवार श्री आशुतोष मुखर्जी के यहां उनका जन्म हुआ। वे 1926 में इंग्लैंड  चले गए और 1927 में बैरिस्टर बन कर भारत लौटे थे। 1934 में कलकत्ता  विश्व विद्यालय के कुलपति बनने वाले वे सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे।
1929 में राजनीतिक जीवन की शुरूआत उन्होंने कांग्रेस पार्टी की टिकट पर  बंगाल विधान परिषद में प्रवेश किया। परन्तु कांग्रेस ने विधानसभा का  बहिष्कार करने का निर्णय लिया, तो उन्होंने इस्तीफा देकर स्वतंत्र उम्मीदवार  के रूप में चुनाव जीत कर बंगाल सरकार में वित्तमंत्री बने।
डा. मुखर्जी जम्मू  कश्मीर राज्य को अलग दर्जा दिए जाने के घोर विरोधी रहे और वे चाहते थे  कि जम्मू कश्मीर भी भारत के अन्य राज्यों की तरह पहचान मिले यही  उनकी सोच थी। देश के संसद में उन्होंने धारा 370 को समाप्त करने की भी  पुरजोर वकालत की थी। 23 जून 1953 को रहस्यमयी परिस्थितियों में  उनकी मृत्यु हो गई।
इस मौके पर विनोद शर्मा, चांद, शमशेर, विजय शेखावत,  सतबीर चौहान, जयपाल सरोहा, सतीश, कैलाश, अनिल व महेन्द्र सहित  अनेक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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