- June 1, 2025
धुएं से मुक्त रसोई होनी चाहिए
प्रमिला——(लूणकरणसर)—-तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, पर गांव की रसोई में महिला अब भी उसी जगह ठहरी हुई हैं जहां हर सुबह धुएं से भरा चूल्हा उनका इंतज़ार कर रहा होता है। लकड़ी, गोबर और सूखे पत्तों से जलता यह चूल्हा सिर्फ उनका वक़्त ही नहीं बल्कि उसकी सांसें, आंख और शरीर के हिस्सों को भी धीरे-धीरे बीमार करता रहता है। यह केवल एक रसोई की तस्वीर नहीं है, बल्कि पितृसत्ता के उस ढांचे की झलक होती है, जो महिलाओं को सुविधाएं प्राप्त करने का अधिकारी मानता ही नहीं है। यह स्थिति देश के किसी एक गांव की नहीं होती है, बल्कि बिहार से लेकर पहाड़ी राज्य उत्तराखंड और बर्फीले क्षेत्र जम्मू कश्मीर से लेकर रेगिस्तानी इलाका राजस्थान तक एक समान तस्वीर देखने को मिल जाएगी.
राजस्थान के बीकानेर स्थित लूणकरणसर ब्लॉक से 19 किमी दूर राजपुरा हुड्डान गांव भी यही तस्वीर पेश करता है. करीब 3200 की आबादी वाले इस गांव की कई महिलाएं अब भी खाना बनाने के लिए मीलों चलकर लकड़ियां बटोरती हैं। अक्सर उनके साथ घर की किशोरियां भी होती हैं. जो स्कूल जाकर अपना समय पढ़ाई या किसी रचनात्मक कार्य में लगा सकती थीं, उसे वह सिर्फ इसलिए गंवा रही हैं क्योंकि समाज मान बैठा है कि “खाना बनाना तो घर की औरतों और लड़कियों का काम है।
हालांकि 2016 में केंद्र सरकार की शुरू की गई उज्ज्वला योजना ने इस गांव के बहुत से घरों की महिलाओं के खाना बनाने के काम को आसान ज़रूर किया है, लेकिन फिर भी उनके कदम रसोई घर से बाहर नहीं निकल सके हैं. यह महिलाएं अब इसी बात पर संतोष कर लेती हैं कि उन्हें आज उन्हें धुएं वाले चूल्हे से आज़ादी मिली है, एक दिन चारदीवारी से भी मिल जाएगी.
चालीस वर्षीय जमना देवी कहती हैं कि जब से घर में गैस सिलेंडर आया है, जीवन बहुत हद तक आसान हो गई है. पहले मिट्टी के चूल्हे पर 7 लोगों का खाना बनाना पड़ता था. दोपहर की तपती धूप में धुएं के बीच खाना बनाना से तबीयत ख़राब हो जाती थी. लेकिन उसी हालत में हमें चूल्हा फूंकना पड़ता था. अब सिलेंडर आ जाने से कम से कम उस नरक से छुटकारा तो मिला. कुछ ऐसी ही ख़ुशी 11वीं में पढ़ने वाली गुड्डी को भी है. जिसे पिछले तीन सालों से अब लकड़ियां चुनने के लिए मां बाहर नहीं भेजती है. वह कहती है कि अब इस बचे हुए समय का उपयोग वह घर के अन्य कामों को निपटाने के लिए करती है ताकि उसे पढ़ने का पूरा समय मिल सके. यानी पढ़ने से पहले उसे भी रसोई और अन्य कामों को करना पड़ता है. लेकिन इस काम से उसके भाइयों को आज़ादी मिली हुई है.
लेकिन गांव के कुछ घर ऐसे भी हैं जहां की महिलाओं के हिस्से में अभी भी धुएं वाले चूल्हे लिखे हुए हैं. किसी के पास आज तक सिलेंडर उपलब्ध नहीं हो सका है तो कोई उसे आपातकाल के लिए संभालकर रखती हैं, और रोज़ की ज़रूरत के लिए फिर उसी धुएं भरे चूल्हे पर लौट जाती हैं। 32 वर्षीय संतोष देवी कहती हैं कि हमारा परिवार बड़ा है. एक सिलेंडर मुश्किल से 15 दिन चल पाता है. जिसे दोबारा भरवाने में पैसे लगते हैं. इसीलिए हम इसे बहुत ज़रूरी होने पर ही खर्च करते हैं. अधिकतर समय इन्हीं चूल्हे के धुएं के बीच समय गुज़रता है.
कालो देवी कहती हैं कि हमें आज तक इस योजना का लाभ नहीं मिल सका है. चूल्हा जलाने के लिए हमें तपते रेगिस्तान में लकड़ियां चुनने के लिए दूर दूर तक चलना पड़ता है. कालो देवी की पड़ोसन विमला कहती हैं कि हमने उज्ज्वला का नाम सुना है, लेकिन हमें आज तक यह नहीं पता है कि इसके लिए कहां आवेदन देनी होगी? कई बार हमने प्रयास किया कि हमारे परिवार को भी इसका लाभ मिल जाए, लेकिन अभी तक नहीं हुआ है. हमारी ज़िंदगी तो धुएं के बीच बीत गई, लेकिन हम चाहते हैं कि हमारी बच्चियों को यह सुविधा मिल जाए.
इसके लिए पहले उसे अपने नज़रिये को बदलना होगा. उस सोच से बाहर निकलना होगा जो महिलाओं को किचन और चारदीवारी तक सीमित रखने की तर्कहीन वकालत करता है. हमें यह समझना होगा कि तकनीक और सुविधा पर सबसे पहला अधिकार उसी का है जो सबसे ज्यादा श्रम करते हैं। अगर सोलर चूल्हों या बायोगैस संयंत्रों को सही मायनों में घर-घर तक पहुंचाया जाए, तो हर घर को धुएं वाले चूल्हों से मुक्ति मिल सकती है. लेकिन इसके साथ साथ समाज को भी उस सोच से मुक्त होने की ज़रूरत है जो महिलाओं के अधिकारों को रसोई घर तक बांध कर रखना चाहता है.

