सुप्रीम कोर्ट में बहस –राफेल पर फ्रांस सरकार की कोई गारंटी नहीं–याचिकाकर्ता के वकील विनीत ढांडा

राफेल सौदे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

केंद्र ने पिछली सुनवाई में 36 राफेल लड़ाकू विमानों की कीमत और उसके फायदे के बारे में कोर्ट को सीलबंद दो लिफाफों में रिपोर्ट सौंपी थी.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की पीठ इस मामले में अहम सुनवाई कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण—-

पहले इस डील में 108 विमान भारत में बनाने की बात की जा रही थी.

25 मार्च 2015 को दसॉल्ट और HAL(हिंदुस्तान एरोनोटिक्स लि०) में करार हुआ और दोनों ने कहा कि 95 फीसदी बात हो गई है.

15 दिन बाद ही प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान नई डील सामने आई जिसमें 36 राफेल विमान पक्के हुए.

इस डील के बारे में रक्षामंत्रालय को भी पता नहीं था, एक झटके में विमान 108 से 36 हो गए.

ऑफसेट रिलायंस को दे दिया गया.

सरकार कह रही है कि उन्हें ऑफसेट पार्टनर का पता नहीं है. लेकिन प्रोसेस में साफ है कि बिना रक्षा मंत्री की अनुमति के ऑफसैट तय नहीं हो सकता है.

ऑफसेट बदलने के लिए सरकार ने नियमों को बदला और तुरंत उसे लागू किया.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को कहा कि कोर्ट में जितना जरूरी हो, उतना ही बोलें. प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि दसॉल्ट ने रिलायंस ग्रुप के 240 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे.

प्रशांत भूषण ने कहा कि इस डील के लिए रिलायंस को ही क्यों चुना गया.

उसके पास तो जमीन भी नहीं थी, रिलायंस फॉर्मूला का ही पार्ट थी.

17 दिन के अंदर ही रिलायंस को जमीन, डिफेंस मैन्यूफेक्चरिंग का लाइसेंस दिया गया.

अरुण शौरी ———–

दसॉल्ट ने रिलायंस को चुना. उन्होंने आरोप लगाया कि दसॉल्ट भी इस समय फाइनेंशियल क्राइसेस से जूझ रहा है, यही कारण है कि उन्होंने सरकार की हर बात मानी और रिलायंस के साथ करार किया. इस डील से दसॉल्ट को भी फायदा हुआ.

अन्य याचिकाकर्ता ————

आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह के वकील ——- सरकार कीमत का खुलासा नहीं किया. जबकि सरकार ने संसद से पहले दो बार कीमत का खुलासा किया था.

18 मार्च 2016 रक्षा मंत्रालय द्वारा दिए गए उत्तर में आईजीए ने सितंबर 2016 को हस्ताक्षर किए. हथियार, उपकरण, सेवा और रखरखाव के साथ राफेल विमान की कीमत 670 करोड़ है.

याचिकाकर्ता के वकील विनीत ढांडा —- पहले 36 एयरक्राफ्ट की डील अनाउंस की गई थी, उसके बाद बात हुई. ये जवाब एफिडेविट में देना चाहिए.

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि राफेल विमान खरीदते समय कई सारी कंडिशन्स को फॉलो नहीं किया गया. कानून मंत्रालय ने इस डील से जुड़े काफी मुद्दों पर शंका व्यक्त की थी.

कानून मंत्रालय ने कहा था कि फ्रांस सरकार ने इसको लेकर कोई गारंटी नहीं दी थी. हम इतना पैसा दे रहे हैं,

फिर भी वहां की सरकार कोई गारंटी नहीं दे रही है.

सरकार ने अपने दस्तावेज में खरीद की प्रक्रिया, ऑफसेट और दाम के बारे में नहीं बताया है.

अप्रैल 2015 में नई डील साइन की गई लेकिन उसकी प्रक्रिया नहीं बताई गई.

दस्तावेज में ये भी नहीं बताया गया है कि क्या रक्षा कमेटी से परमिशन 36 एयरक्राफ्ट के लिए ली गई थी या फिर पहले की ही परमिशन थी.

उन्होंने कहा कि कागजात बता रहे हैं कि विमान में वही चीजें हैं जो पहले थीं, तो ये कैसे कह रहे हैं कि ये डील बढ़िया है.