” शाख़ पे तन्हा उदास न बैठ, क्या उड़ान भूल गया मुद्दतों की बंदिश में”: मोहित जौहरी

आज उड़ान और परिंदो पर कुछ विचार अपने शुभचिंतक भाइयों को देना चाहा तो कलम दस्तक देने लगी हाथों को की कुछ कागज़ पर उतरा जाये।

दोस्त उड़ान और परिंदों के बीच ज़िन्दगी का रिश्ता है जैसे अगर परिंदा उड़ना छोड़ दे तो ज़िन्दगी से ताल्लुकात खत्म होने जैसा है उसके लिए।1
ऊंची उड़ान परिंदो के लिए सांसे जैसी है।

अब हम इसी उड़ान को अपने लिए सोंचे तो ज़रा से चिंतन से ही मालूम हो जायेगा की हमारी उड़ान को कौन सी परेशानियां आ गयी है?

क्या हम जीवन में उड़ान रूपी सांसो को भूल गए?

क्या हमें कैद किया जा रहा ?

क्या पंख काट दिए गए है?

आखिर क्यों हम बंदिशों के जाल में कैद होते जा रहे?

आखिर क्यों हमे अपने अंदर की छमताओं का आभास नहीं?

आखिर हम खुद पर भोरोसा क्यों खोते जा रहे?

जवाब इन सब सवालों का सिर्फ एक है:

जवाब यह है कि हम खुद से रूबरू होना ही भूल गए,दुनिया के लिए समय निकाल रहे पर खुद से मुखातिब नही हो पा रहे।

मेरा यकीन मानिए जिस रोज़ हमने खुद से खुद की चर्चा कर ली तो ज़िन्दगी की सब अटकले और रुकावटें खुद ब खुद सिमट जाएँगी।

हम दूसरों को उनकी मंज़िल तक पहुचानें के लिए अपने पंखों का इस्तेमाल कर रहे मतलब अपनी ताकत को खुद के लिए न लगाकर दूसरे के सपने सच कर रहे।

आशय सिर्फ इतना सा है जब गैरों को हमारी ताकत हमारी काबिलियत पर यकीन है तो आखिर हम खुद अपना आसरा क्यों बर्बाद कर रहे।

क्यों हम अपने आने वाले कल को गंदा कर रहे।

“परिंद शाख़ पे तन्हा उदास बैठा है
उड़ान भूल गया मुद्दतों की बंदिश में”

तो दोस्त उदास न बैठो।
हताश न बैठो,मुकाम आसमा का है ,सफर भी तुम्हारा है और रास्ता भी तुम्हारा है।

अपने रास्ते अपने दरवाज़े अपने मुकाम हासिल करो।
आगे बढ़ो
बढे चलो
बस बढे चलो।।।।

“अब तो मिल जाओ तुम खुद से अपनी ख़ातिर,,
इतनी दूर आ गए खुद से किनारा करते करते।।।

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