शपथ क्या है ???—– शैलेश कुमार

शपथ खाने योग्य वस्तु है , खाया जाता है
थाली में , कटोरा में , पत्तल में या फिर तलहथी में ????

शपथ अदृश्य है , मन की भावना है , विश्वशनीय वस्तु है
अपने वाक्य को सत्यापित करने की मुखास्त्र है।

यह ईश्वर से भी बड़ा है ,इस पर ईश्वर को भी भरोसा है।
इसका अर्थ है बन्दे की कथनी और करनी में दम है

यह प्राण -प्रण निष्ठा है ,शपथ विकार रहित -अशरीरी है
शपथ के पथ पर निश्छल भाव से गमन किया जाता है।

शपथ लेने के बाद पूर्ण प्रतिष्ठित हो जाता है।
दृढ पथ पर चलने का यह दुर्गम वस्तु है।

शपथ पर जज को विश्वास है ,शपथ पर पत्नी को विश्वास है
शपथ पर ईश्वर और यमराज को विश्वास है।

शपथ से ही विश्वामित्र ,शपथ से ही सप्तऋषि
शपथ से परशुराम शपथ से ही राम का वनवास हुआ।

शपथ पर माँ और बेटों को विश्वास है
शपथ पर प्रेमी -प्रेमिका को विश्वास है
शपथ से ही वे दोनों पेड़ की टहनी से झूल जाते है।

शपथ खाने के बावजूद भी नेताओ पर विश्वास नहीं है
कोर्ट में शपथ खाने वालों पर विश्वास नहीं है
पुलिस और सरकारी दफ्तरों पर विश्वास नहीं है

क्योंकि ये शपथ को ही खा जाते हैं।