राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ–अर्थात शाखा तंत्र

९१ वर्षों पूर्व प्रारंभ हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य आज भारत में प्रभावी सामाजिक संगठन के रूप में उभरा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और द्वारका से परशुराम कुंड तक फैली अपनी पवित्र तथा विशाल मातृभूमि के प्राय: सभी प्रमुख स्थानों पर संघ शाखा कार्यरत हैं। 1
प्रारंभिक काल में संघ के विचारों से सहानुभूति रखने वाले लोगों की संख्या अत्यल्प थी, आज उनकी संख्या करोड़ों में गिनी जा सकती है। इतने विशाल पैमाने पर संघ कार्य का विस्तार कैसे हुआ ? क्यों हुआ ? क्या प्रारंभ में विदेशी अंग्रेजों और बाद में अपने ही शासनकर्ताओं की ओर से संघ कार्य में आधाएं डालने के प्रयास नहीं हुए? क्या संघ को समूल नष्ट करने के प्रयास किसी ने नहीं किए? यह प्रश्न सामान्य व्यक्ति के मन में भी जरूर उठते होंगे।

भारत की सर्वांगीण उन्नति के लिए हिन्दुओं का संगठन एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। अपने विचारों और संस्कारों के साथ हिन्दू यदि इस देश में बहुसंख्यक रहा, तभी भारत में लोकतंत्र, विचारों की उदार दृष्टि, समाजवाद और सर्व धर्म समभाव भी बना रहेगा। सम्पूर्ण विश्व को लुभाने वाला एकात्म राष्ट्रजीवन यहां विकसित हो सकेगा। जनमानस में इन विचारों की स्वीकृति के अनुभव हो रहे हैं।

यह विचार की भी मान्यता बढ़ रही है की आज के युग में तो राष्ट्र की रक्षा और पुन:स्थापना करने के लिए यह आवश्यक है कि धर्म के सभी प्रकार के सिद्धांतों को अंत:करण में सुव्यवस्थित ढंग से ग्रहण करते हुए अपना ऐहिक जीवन पुनीत बनाकर चलनेवाले, और समाज को अपनी छत्र-छाया में लेकर चलने की क्षमता रखनेवाले असंख्य लोगों का सुव्यवस्थित और सुदृढ़ जीवन एक सच्चरित्र, पुनीत, धर्मश्रद्धा से परिपूरित शक्ति के रूप में प्रकट हो और वह शक्ति समाज में सर्वव्यापी बनकर खड़ी हो।

इन विचारों की मौलिकता तथा उन्हें साकार करने के लिए उसके अनुसार असंख्य संघ स्वयंसेवकों का जीवन व्यवहार यही आज अनेक लोगों को संघ की ओर आकर्षित कर रहा है।

इसी विचार को लक्ष्य बनाकर चलनेवाला संघटन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके लिए एक अनोखी कार्यपद्धति का निर्माण संघ ने किया है जिसका नाम है शाखा तंत्र। इसे जानने की इच्छा आज समाज के सभी वर्गों में बढ रही है। वेब और सोशल मीडिया पर संघ की बढती गतिविधि ऐसे ही लोगोंतक पहुचने का प्रयास कर रही है।