मैं भी अपने तरकश में कुछ तीर लाया हूं

बहादुरगढ़ (कृष्ण गोपाल विद्यार्थी)—– साहित्य व संस्कृति को समर्पित संस्था कलमवीर विचार मंच द्वारा कृष्ण कुंज में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। गांव खरमाण निवासी संस्कृत विद्वान पंडित आज़ाद शास्त्री के सानिध्य में संपन्न इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ ग़ज़लकार सतपाल स्नेही ने की व संचालन किशोर मनु ने किया।1
गोष्ठी का शुभारम्भ युवा शिक्षाविद् अजय भारद्वाज की रचनाओं से हुआ। देश के युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-
चारों ओर से मिली निराशा,
तुम से ही अब मेरी आशा ।
कवि-कलाकार विरेन्द्र कौशिक ने अपनी हरियाणवी रचना के माध्यम से एक कन्या भ्रूण की पीड़ा को अभिव्यक्ति देते हुए कहा-
जन्म लेण ते पहलां मनै मार नहीं सुख पावैगी,
शर्म ते सिर झुक ज्यागा ज्यब तू हत्यारण कहलावैगी।
लखमीचंद डेरोलिया ने भी देश में हो रहे नारी शोषण को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा-
जो इसको बेचें या खरीदें वे कैसे व्यापारी हैं,
निन्दा करके दण्ड दीजिए, इसी के वे अधिकारी हैं।
युवा कवि शिव कुमार पाराशर ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति से सभी को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने कहा-
द्रौपदियों की रक्षा हेतु चीर लाया हूँ,
आहत वीरों के लिए शमशीर लाया हूँ।
आज कलमवीरों के कौशल का आयोजन है,
मैं भी अपने तरकश में कुछ तीर लाया हूँ।
पंडित आजाद शास्त्री ने पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव पर खेद जताते हुए अपनी गौरवशाली वैदिक संस्कृति अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा-
वेदों का, उपनिषदों का संदेश अनोखा भुला दिया है,
” सत्यमेव जयते ” तो मानो गहरी निद्रा सुला दिया है।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे गीतकार विद्यार्थी ने जीवन की विसंगतियों पर टिप्पणी करते हुए कहा-
गाँव के बच्चे शहर में ढूंढते हैं रोजगार,
है शहर को गाँव की सोंधी हवाओं की तलाश।
अब मनिआर्डर तो क्या ख़त भी कभी आता नहीं,
डाकिये में खो गई कुछ बूढ़ी मांओं की तलाश।
वरिष्ठ ग़ज़लकार सतपाल स्नेही ने पुरसोज तरन्नुम के साथ रचनाएँ प्रस्तुत कर समां बांध दिया। एक बानगी देखिए-
तुम खुशी को भी आज़माओ तो,
खुद को ग़म से ज़रा बचाओ तो।
ग़म के दरिया भी सूख जाएंगे,
तुम जो थोड़ा-सा मुस्कुराओ तो।
कार्यक्रम में उपस्थित रहे कवियों ने आयोजन की सफलता पर खुशी जताते हुए ग्रामीण अंचल में भी साहित्य व संस्कृति के उत्थान हेतु आवश्यक कदम उठाने का आह्वान किया।