‘मास्टर ऑफ द रोस्टर ‘–विवादों का कारण –मेडिकल स्कैम में–जजों को रिश्वत की पेशकश

दिल्ली —— नवंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट के कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच (संवैधानिक पीठ) ने अहम फैसला दिया था.

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पांच जजों की बेंच ने अपने फैसले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’बताया. इसके अनुसार चीफ जस्टिस अपने विवेक से यह तय कर सकता है कि कौन से केस की सुनवाई किस जज की बेंच करेगी.

‘मास्टर ऑफ रोस्टर थ्योरी’ के तहत चीफ जस्टिस को अधिकार है कि वह जजों के बीच केसों का आवंटन करें.

पांच जजों की बेंच ने यह फैसला जस्टिस जे चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली दो जजों के बेंच के उस फैसले को पलटते हुए दिया था, जिसमें जस्टिस जे चेलामेश्वर ने करप्शन के एक मामले की सुनवाई के लिए पांच सीनियर जजों की बेंच बनाने के आदेश दिए थे.

‘मास्टर ऑफ द रोस्टर थ्योरी’ पर फैसला देते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने यह साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के कोई भी जज खुद से यह फैसला नहीं ले सकते कि वो किस केस की सुनवाई करना चाहते हैं और किस केस की नहीं. वहीं, सुप्रीम कोर्ट के जज किसी विशेष मामले की सुनवाई के लिए अलग से बेंच बनाने के लिए चीफ जस्टिस को निर्देश भी नहीं दे सकते.

किस करप्शन केस के कारण सामने आई ये थ्योरी ?

मेडिकल कॉलेज स्कैम केस की वजह से ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ थ्योरी को लेकर विवाद सामने आया. इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी. सीबीआई के मुताबिक, मेडिकल स्कैम केस में कुछ ‘खास’ लोग भी शामिल थे. इनमें ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज का नाम भी है. सीबीआई के मुताबिक, ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज ने इस केस की सुनवाई को प्रभावित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिश्वत की पेशकश भी की थी.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच मेडिकल कॉलेज स्कैम की केस की सुनवाई कर रही थी.

अब इस केस को लेकर दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं. एक याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील कामिनी जायसवाल ने और दूसरी एक एनजीओ की ओर से दाखिल की गई है. दोनों ही याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में एसआईटी जांच की मांग की है. दोनों पीआईएल में कहा गया है कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को इस केस से संबंधित किसी भी कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनना चाहिए.

चीफ जस्टिस की बेंच ने ऐसे पलट दिया केस

जस्टिस जे चेलामेश्वर की बेंच ने कामिनी जायसवाल के पिटीशन पर सुनवाई की थी. उन्होंने एफआईआर में आरोपों को काफी गंभीर पाया. बेंच ने करप्शन के इस मामले की सुनवाई के लिए पांच सीनियर जजों की बेंच बनाने के आदेश दिए. लेकिन, इसके कुछ दिन बाद ही चीफ जस्टिस ने अलग से बेंच बनाई और ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ का सिद्धांत दिया. चीफ जस्टिस की बेंच ने इस केस को बाद में खारिज कर दिया और याचिकाकर्ताओं पर 25 लाख रुपये हर्जाना लगाया गया.

इन केस में अलग बेंच बनाने से बढ़ा विवाद

मेडिकल कॉलेज स्कैम केस के अलावा कुछ और मामले भी हैं, जिनपर सुनवाई के लिए अलग से बेंच बनाई गई और इससे विवाद और बढ़ा. इसमें एक मामला स्पेशल सीबीआई जज बीएच लोया की कथित रूप से संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का भी है. दिसंबर 2014 में जस्टिस बीएच लोया की कार्डिएक अरेस्ट से मौत हो गई थी. जस्टिस लोया शोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे. जस्टिस लोया के परिवार के मुताबिक, उनकी मौत नैचुरल नहीं थी, वे काफी तनाव में थे.

11 जनवरी 2018 को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस लोया की मौत को लेकर दायर पीआईएल पर त्वरित सुनवाई की. चीफ जस्टिस ने इसके बाद इस मामले की सुनवाई के लिए जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में एक बेंच बना दी.

इस केस में जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच ने 15 जनवरी तक महाराष्ट्र सरकार में काउंसिल निशांत आर कटनेश्वरकर से जवाब मांगा है. बता दें कि इस केस में वरिष्ठ जजों को दरकिनार कर अलग बेंच बनाने से 4 जजों ने आपत्ति जाहिर की थी.

क्या कॉलेजियम के सदस्यों के बीच असंतोष है ?

कॉलेजियम सिस्टम के तहत सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और चार सीनियर जजों का फोरम जजों के अप्वॉइंटमेंट्स और ट्रांसफर की सिराफिश करते हैं. हालांकि, भारत के संविधान में कॉलेजियस सिस्टम को लेकर कुछ लिखित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में इस सिस्टम की शुरुआत 28 अक्टूबर 1998 में हुई थी.

कॉलेजियम सिस्टम को लेकर बीते साल अगस्त से विवाद शुरू हुआ है. जस्टिस जे चेलामेश्वर सुप्रीम कोर्ट में दूसरे सीनियर जज हैं. वह सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के अप्वॉइंटमेंट्स और ट्रांसफर की सिफारिश करने वाली दोनों कॉलेजियम का हिस्सा हैं. कॉलेजियम सिस्टम को लेकर जस्टिस जे चेलामेश्वर की पूर्व चीफ जस्टिस जेएस खेहर के साथ मतभेद सामने आ चुके हैं.

कॉलेजियम सिस्टम पर अभी भी स्थिति साफ नहीं हो पाई है.