मामला 500 रुप्ये का :- शैलेश कुमार

बरसात की मौसम और बाहर निकलना । एकबार सोचना ही पड़ता है। आगे -पीछे सोच -विचार कर निर्णय लिया जाता है कि चलो बरसाती ले ही लें। बेचारी बरसाती भी अपने को भाग्यशाली समझती है। उसके मन में लडडू फुटने लगता है। आखिर 9 माह के बाद  काम आ ही गये !  

उसने सोचा की बरसात की मौसम है क्यों न हरिद्वार जैसे पावन स्थल में मौजमस्ती लिया जाय ! यह सोच कर, जाने सेे पहले, एक बरसाती खरीदा। बन ठन कर यात्रा पर रवाना हुआ। जब दिल्ली बस अडडा पर गया तो नजारा कुछ और ही था। बादलों की कड़कड़ाहट और फटकार से दिल दहलने लगा। दिल सोचने को मजबूर हो गया की अगर बादलों  का यह तेवर यहाॅं ऐसा है तोे हरिद्वार के वासिंदोें के विरूद्ध  कितना सूर्ख होगा !

बादल तो बादल ही होता है । उसे बदल नहीं सकते। उसमें बदलवानेे की असीम क्षमता है। वही बदल सकता है। हम ढॅकन का सहयोग लेे सकते है , ढाॅकने का नहीं। फिर अबुझमार लोग अपने कोे भौतिक सामग्रीयों के सहारे सक्षम समझते है। प्रकृति को चुनौती देते हुए अभियान पर चल देतेे हैं और अभियान उसी तरह असफल हो जाता है जैसे स्वच्छता मिशन टाँय -टाँय फिस्स हो गया।  सिर्फ फोटो खिंचवाने के  दिन शेष है।

हुआ यों कि एक बार वह बारिष के मौसम मेें हरिद्वार – ऋषिकेेश की यात्रा पर निकल पडा। उसे मैदानी बादलों का ज्ञान था, पहाड़ी क्षेेत्र के बादलों का नहीं। मैदानी बादल यों मुॅह लटकाते दिखते हैं लेकिन जब फटने की बारी आती है तो ऐेसे सटक जाते है जैसे नेता जी के नारियल और पत्थर पर माल्यार्पण के बाद  शिला का न्यास।

पहाड़ी क्षेेत्र के बादल जैसे दिखता है,  वैसे बरसता भी है , ऐसे बरसने लगा जैसेे आज ही ऋषिकेेश का नामोनिशान मिट जाएगा । इस भयंकर स्थिति में भी वहाॅ रेनकाट बेेचने वाला था । 20 रूप्ये में रेनकाॅट लिया । लेकिन दस कदम के  बाद ही  बर्बाद हो गया ।

वहाॅं की कल्पना करते – करते दिल्ली के बस अडडा पर सारी रात गुजर गया। लेकिन इस बार की यात्रा के लिए बरसाती साथ में था। अन्य लोगों की तरह उसने भी बरसाती पहनने की इच्छा की परंतु एकाएक रूक गया। तथ्यपूर्ण विचार उभड़ने लगा की अगर ऋषिकेेश के रेनकाट की तरह इसका भी हालत यों ही  हो गया तो 500 रूप्या बर्बाद ही जायेगा।

उसका मूल्य 20 रूप्या था लेकिन इसका तो 500 रूप्या है। दूसरी समस्या यह थी की भींगनेे से बच भी गया तो थैला को भींगने से कौन बचायेगा ? थैला को भींगने से कैसे बचाया जाय ! बादल तो अपने अंतिम पड़ाव का नाम नहीं ले रहा है। इसी दुविधा में  घंटोे गुजर गया। हाल संसद में बैठे नेताओ की तरह था , जो न सो सकता है और न जाग सकता है।

एक बूत बन कर ठहर गया। एक लाचार और उपायहीन मानव की तरह वह बैठ रहा । एकाएक रिमझिम  तथा मचलते बादलों की ताल पर मचल गया। उसने निर्णय लिया की भींग जाय तो भींग जाय लेकिन 500 रूप्ये वाला बरसाती की ऐसी- तैसी नहीं करेगा और वह बादलों की मस्ती लेने के लिए निकल पड़ा। निकल पड़े वह खुले बादलों के तले , अपनी मंजिल पर पहुॅचने के लिए।

मन बार – बार कह रहा था बरसाती बरसात में काम नही आयेगा तो क्या गर्मी के मौसम में ! लेकिन मन की बात तो वह सुनता और करता है जिसके पास कोई अनुभव न हो या जो मन के गुलाम ।  अगर बादल अपने ही मन की बात करेगा तोे बादल को बधाई। मन की बात भी करूँ और वह भी उधार लेकर तो इससे बेहतर है की मन मार कर ही क्यों न रहूँ।

फलत: रात को  विदाई देते हुए हरियाणा रोडवेज में बैठा। बस ऐसी भाग रही थी जैसे पीछे से उस पर बाघ ने हमला कर दिया हो । लग रहा था एकाएक जीवन ठहर गया हो तथा यही अंतिम पडाव है । लेकिन संयोग बढ़िया था,उम्र अभी जाने के अंतिम पड़ाव पर नहीं था इसलिए बहादुरगढ़ बस अड्डा पर सही सलामत पहुँचाने के लिए बस के साथ- साथ चालक साहब को धन्यवाद किया ।

घर आकर वह खुश था की बरसाती ठीक उसी तरह तहवन में था जैसे दुकानदार ने दिया था ।