भ्रष्टाचार का जिन्न और मधु कोड़ा –सुरेश हिंदूस्तानी

भारत में पूर्व की केन्द्र और राज्यों की सरकारों में शामिल रहे कई राजनेताओं द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की गूंज अभी भी वातावरण में तैरती हुई दिखाई दे रही है। इससे ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार तो हुआ है। लेकिन सवाल यह आता है कि भ्रष्टाचार करने वाले नेताओं को सजा मिलने के बाद भी भ्रष्टाचार के माध्यम से हड़प की गई राशि वापस क्यों नहीं ली जाती।
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वास्तव में भ्रष्टाचार सिद्ध होने के बाद उन राजनेताओं से वह राशि भी वापस लेना चाहिए। अगर ऐसा हो गया तो स्वाभाविक रुप से वह सत्य भी सामने आएगा कि इसमें और कौन लोग लिप्त हैं।

हम जानते ही हैं कि पूर्व की सरकारों के समय हर दिन नित नए भ्रष्टाचार की आवाज सुनाई देती रहती थी, कई मामले आज भी चल रहे हैं। जिसमें कोयला घोटाले का भ्रष्टाचार रुपी जिन्न एक बार फिर से बाहर आ चुका है। इस जिन्न ने अबकी बार पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को अपने लपेटे में लिया है। दस साल पुराने इस मामले में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को दोषी ठहराया गया है।

यहां सबसे पहले यह सवाल खड़ा होता है कि जब हमारे नीति निर्माता ही ऐसे भ्रष्टाचार करके जनता के पैसों को हजम करेंगे तो फिर अच्छा काम कौन करेगा। कई नेता भ्रष्टाचार करने के बाद भी बड़ी शान से राजनीति कर रहे हैं। भ्रष्टाचार करने के बाद भी पूर्व सरकारों में प्रमुख भूमिका का निर्वाह करने वाले भ्रष्टाचार के विरोध में बात करें तो वे निसंदेह हंसी का पात्र ही बनते दिखाई देते हैं। इससे एक बात और परिलक्षित होती हुई दिखाई देती है कि मधु कोड़ा और लालू प्रसाद जैसे राजनेता किस प्रकार से अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग कर देश को हानि पहुंचा रहे हैं।

इस प्रकार के कृत्य करने के लिए केवल मधु कोड़ा और लालू ही नहीं, बल्कि और भी कई नाम हैं जो भ्रष्टाचार की काली कमाई के माध्यम से करोड़ों की संपत्ति के मालिक बन गए हैं। इसमें ए. राजा, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी जैसे भी शामिल किए जा सकते हैं। इन्होंने भी अपने राजनीतिक प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए संपत्तियां अर्जित की हैं। हालांकि लालू प्रसाद यादव की संपत्ति के बारे में आज भी जांच चल रही है, लेकिन एक मामले में तो लालू प्रसाद यादव को सजा भी हो चुकी है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार तो हुआ है। इतना ही नहीं इसके अलावा देश के कई बड़े राजनीतिज्ञों के नाम भी बड़े भ्रष्टाचारों के साथ संलग्न हैं। यह सारे मामले राजनीतिक में बढ़ते भ्रष्टाचार की गवाही देते हैं। यह बात भी सच है कि जब ये राजनेता सत्ता का संचालन कर रहे थे, तब राजनीतिक भ्रष्टाचार चरम पर था।

बिना भ्रष्टाचार के कोई भी काम नहीं होता था। देश की जनता बहुत परेशान थी। सरकारी संसाधनों का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा था। देश के बहुचर्चित बोफोर्स तोप घोटाले ने तो राजीव गांधी को गद्दी से उतार दिया था। इसलिए यह कहा जा सकता है कि देश की जनता भ्रष्टाचार को किसी भी रुप में स्वीकार नहीं कर सकती। जनता जवाब देती है और ऐसा जवाब देती है कि जिसकी राजनेताओं को उम्मीद भी नहीं होती।

आज ऐसे भ्रष्ट राजनेताओं की संख्या बहुत ज्यादा है, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। ऐसे मामले राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते बहुत लम्बे समय तक भी चलते रहते हैं और जब तक यह आरोप सिद्ध नहीं होते, तब तक यह राजनेता अपनी राजनीति करते रहते हैं। इसलिए भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ चल रहे मुकदमों को निपटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को अलग से विशेष न्यायालय गठित करने का आदेश देना पड़ा है। दरअसल भ्रष्टाचार राजनीतिज्ञों के मानवीय चरित्र में रच गया है। राजनीति करना कभी देश की सेवा मानी जाती थी।

अब पैसा कमाने, अपनी ताकत बढ़ाने का जरिया बन गई है। इसके विपरीत वर्तमान केन्द्र सरकार ने देश की जनता के मन में बसी इस धारणा को समाप्त करने के प्रति एक विश्वास पैदा किया है। आज केन्द्र सरकार के स्तर पर यह बात पूरी दम के साथ कही जा सकती है कि आज केन्द्रीय स्तर पर राजनीतिक भ्रष्टाचार पूरी तरह से समाप्त हो गया है। नीचे भी समाप्त हो जाएगा, यह धारणा भी बनने लगी है, क्योंकि कहा जाता है कि जब शासक की नीयत अच्छी होती है तब अन्य सभी स्तरों पर भी सुधार की संभावना भी दिखाई देने लगती है।

लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों पर टिकटें बांटने के आरोप लगते हैं। कई बार तो ऐसा भी सुना जाता है कि पैसों की दम पर टिकट मिल जाते हैं। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती पर ऐसे आरोप सरेआम लगाए गए। टिकट बांटते समय उम्मीदवार की काबलियत के साथ-साथ यह भी देखा जाता है कि वह चुनावों में कितना पैसा खर्च कर सकता है। फिर 50-100 करोड़ रुपए खर्च कर चुनाव जीतने वाला नेता मंत्री या मुख्यमंत्री बनकर पहले अपना खर्चा ही पूरा करता है और कमाई भी खुद करता है। इसी कमाई का आधार भ्रष्टाचार करने के लिए प्रेरित करता है।

इन हालातों में भ्रष्टाचार से मुक्ति की उम्मीद करना बेहद मुश्किल है। जब किसी राज्य में सरकार का नेतृत्व करने वाला मुख्यमंत्री ही भ्रष्ट होगा तो अन्य मंत्रियों, नेताओं व अफसरों में तो भ्रष्टाचार रूकना असंभव है। बेशक केंद्र सरकार के कानूनों व सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेशों पर भ्रष्टाचार में कुछ हद तक गिरावट आएगी, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर मजबूती व एकजुटता से कोई मुहिम नहीं चल सकी है। केंद्र सरकार की सख्ती का राज्य सरकारों पर खासा प्रभाव नहीं होता। राज्यों में सत्तापक्ष के नेता मनमानियां करते हैं और प्रशासनिक कार्यों में दखलअंदाजी करते हैं। केंद्र की सख्ती का यहां कोई प्रभाव नहीं होता।

भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त निर्णय लेने की जरूरत है, लेकिन राजनीति में सुधार के बिना भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता। राजनैतिक पार्टियों को ईमानदारी, त्याग, सच्चाई जैसे गुण उम्मीदवार की योग्यता में शामिल करने होंगे। विकासशील देशों की सफलता का राज केवल कानूनी सख्ती नहीं बल्कि स्वच्छ राजनीति भी है।