भैंस बड़ी या औरत

भैस के आगे बीन बजाओ भैंस खड़ी पगुराय (व्यंग्य )
आलोक चंटिया –  भारत  विश्व में दूध उत्पादन में विश्व का नंबर एक देश क्या बना कि जिधर देखिये बस भैस ही भैंस दिखाई देने लगी है अब आप तो मनुष्य है और आपको ये तो समझ में आ ही गया होगा कि हम्मे से किसी के पास भैस से बात करने के अलावा क्कोई विकल्प शेष ही नहीं है तो मैं भी इसी काम में जुट गया कि चला भैस से ही पूछ कर देख ले कि अक्ल बड़ी या भैंस \ सामने ही एक भैंस खड़ी थी मैंने कहा देवी क्या आप बताएंगी कि अक्ल बड़ी या भैंस ??? वो सुनकर चारा कहती रही मानो कह रही हो भैंस के आगे बीन बजाते रहो……..———मुझे भी ऐसा लगा मनाओ मैं भैंस से नहीं देश की संसद में कोई सवाल पूछ रहा हूँ पर जब कई बार पूछा तो भैंस को दया आ गयी और बोली कि अक्ल !!!  मैंने कहा जी नहीं भैंस बड़ी होती है उसने कहा पूरे मनुष्य हो किसी दिन कोई तुम्हरी ऐसी तैसी करोगे तब जान पाओगे कि मनुष्य के हा में हा मिलाना कितना जरुरी है | मैंने कहा कि मनुष्य के हा में हा मिला कर तुमको क्या फायदा वो तो तुमहरा दूध तक निकाल लेता है |

भैंस बोली क्या बात करते हो मैं जिन्दा ही तभी हूँ जब हा में हा मिलती हूँ देखो ना जो भी लड़की तुम्हरे देश में पुरुषो का कहना नहीं मानती उसको मार डालते हो , जिन्दा जला देते हो , शरीर के अंग अंग काट डालते हो और ज्यादा मर्दानगी दिखानी हुई तो एक लड़की के साथ कई पुरुष बलात्कार करते हो तो भला मेरी क्या मजाल जो मैं पुरुष के आगे कुछ कर सकूँ वो तो भला मेरी अक्ल का जो मैं पुरुष को जल्दी समझ गयी और चाहे ये मुझे खूंटे में बांध कर दूध निकाले या पैर बांध कर निकाले मैं चुप चाप अपना दूध इसे दे देती हूँ कम से कम दूध के लालच में ये मुझे जिन्दा तो रखते है | मैंने कहा ऐसा नहीं है मनुष्य सभी के साथ ऐसा नहीं करता !!!!

भैंस हंसने लगी ( अब ये नही बता पाउँगा कि हसि कैसी ) और बोली मेरे पति को ( नर भैस ) को यही भ्रम था और देखो उसको काट कर ये मनुष्य खा गए और कोई बोला तक नहीं कहने लगे कि अगर खाने से रोक तो असहिष्णुता कहके इतना काटूंगा कि तुमको अपने होने पर तरस आने लगेगा |

देखते नहीं मनुष्य को न सुनना पसंद तक नहीं एक लड़की ने नमा कर दिया कि मैं तुमको नहीं पसंद करती तो तेजाब से उसका मुह ही जला डाला और मैंने तो सुना है कि इस देश में ऐसी जली हुई हज़ारों लड़कियां हो गयी है और बताओ मैं अपने दूध निकालने पर विरोध क्या खाकर करू ??

अमिन तो यही सोच कर खुश हूँ कि चलो इनको मुझे घंटे में बांध कर रखने की आदत है | जो ये कहे भूसा कहो तो वो खाओ  अगर ये कहे कि घास , रोटी खाओ तो वो खाओ अगर जरा सा अपनी मर्जी दिखाई और कहने से मना किया तो ये कहने लगते है कि अब ये किसी काम की नहीं रही और इतने दिन बंधक की तरह रखने के बाद बाजार में हमको बेच देते है ( आज मानव तस्करी का जो नंगा नांच चल रहा है उसमे क्या मजाल जो लड़की कुछ कह सके)|

इस लिए इनकी लात लाठी , खाकर सुख भूसा खाकर इन्ही के लिए बंधी रहती हूँ | इन्होने खुद निश्चित कर लिया है कि मेरे लिए सुबह दूध दो शाम को दूध दो तो दे देती हूँ कोई मेरा तो अपने शरीर पर अधिकार है नहीं ये हमारे मालिक जो बन बैठे है |अब तो इनकी क्रूरता के इतने आदि हो चुके है कि कभी चीखते भी नहीं आखिर उससे होगा क्या और मार पड़ेगी |

चारो हाथ पैर बांध दिए जायेगे और मेरा सारा रस जबरदस्ती निचोड़ लेंगे (औरत के साथ आज कुछ ऐसा ही हो रहा है पर आप क्यों मैंने लगे आखिर आधुनिकता की परिभाषा में सब झूठ जो कहना है ) और मजे दार बात ये कि इन्होने ही खुद कहना शुरू कर दिया कि भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस कड़ी पगुराय .अब वो बेचारी चुपचाप गूंगी होकर ना कड़ी हो और आपकी आवाज सुनकर अपना दर्द कहने लगे तो उसका क्या हाल होगा ये कहने कि जरूरत नहीं आपको अपने यहाँ लड़कियों की दुर्दशा तो पता ही होगी कि कही भूल से भी किसी बाहरी से अपना दर्द कहा नही कि चमड़ी उधड़ी नहीं तो बहु को सब सह कर गाय अगर कहलाना है तो बीन सुनकर भी बोलना नहीं है |

मैं भैंस का दर्शन सुन कर अवाक् था क्या आपको भैंस की बात सही लगी क्या हमने भैंस और लड़की में कोई फर्क ही नहीं रखा है | पर आप क्यों निर्भया , नेहा , नैना साहनी , के कड़वे सच को मान कर भैंस को सच्चा साबित होने दे आखिर आप मनुष्य है वो भैंस है उसका काम ही दूध देना है जरा कभी किसी जंगली भैंस का दूध लेकर देखिएगा आपको खुद के छठी का दूध याद आ जायेगा |

वैसे जब लड़की  को काट पीट डालने की कला का विकास तेजी से हो रहा है तो क्यों नहीं औरत को जानवर के समकक्ष  रखने का आंदोलन चलाया जाये आखिर लड़की जाने तो उसे आज भी हम मानव मान ही नहीं पा रहे है

(वैसे आप इतनी हज़ारों लाखो घटनाओ के बाद भी नहीं मानेगे कि लड़की के साथ अत्याचार बढ़ रहा है आखिर बाजी राउ  मस्तानी का उदहारण जो है ) इस व्यंग्य में ढूंढिए कि हम सब मिल कर महिला को कहा ले जा रहे है और उसको क्या मिल रहा है मानव की श्रेणी में खड़े होकर | डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय  अधिकार संगठन