भाग – 9–1987 —पारिजात के फूल —-विजय कुमार सप्पत्ती, तेलंगाना

————————–गतांक से आगे ————————-

ऐसे ही दो साल बीत गए.पारिजात को अपनी भाभी के ताने सुनने की आदत हो गयी vijay 2थी. उसका ज्यादातर समय हमारे घर पर ही बीतता था. इस बीच में मैने कुछ रुपये जमा किये और अगली यात्रा में जब घर गया तो लालाजी को उनका कर्जा वापस कर दिया. लालाजी ने कहा भी कि रहने दे अब इन पैसे का क्या करूँगा, जो इन का उपयोग करे ऐसा अब कोई है नहीं. मैंने कहा लालाजी, मुझे भी अपना बेटा समझिये. लालाजी ने कुछ नहीं कहा.
उसी दिन शामको कन्हैया की माँ आई और सुबह जो पैसे मैंने लालाजी को दिया था उसे वापस करते हुए उन्होंने कहा कि लालाजी ने पैसे वापस कर दिए है और कह रहेही ये छुटकी की शादी का दहेज़ ही समझ लो.
मेरी आँखें गीली हो गयी. कुछ दिन रहकर मैं वापस अपने काम पर चला गया .
दीवाली के दिन थे, जबमैं अपने घर पर छुट्टी पर पहुंचा. दिए लगाये गए. पूजा हुई. थोड़ी देर बाद पारिजात आई.उसकी बेटी बहुत सुन्दर दिख रही थी.मैंने उसे गोद में उठा लिया.उसकी टूटी फूटी बाते मन को बहुत सुहाती थी.उसने अचानक मुझसे पुछा ‘ आप कौन है ?‘
मैं कोई जवाब देता, इसके पहले ही पारिजात ने कहा ‘ ये तेरे पापा है ! ‘
ये सुनकर मैं भौचक्का रह गया. माँ भी आश्चर्यसे उसकी तरफ देखा और पुछा ‘ क्या हुआ पारिजात ? अचानक ये ?

पारिजात रोने लगी. फिर माँ ने उसे चुप कराया तो पता चला कि उसकी भाभी मेरे नाम से उसे ताने देती है, और रोज कोई न कोई बात जरूर करती है. और मोहल्ले वालोंको भी उसके और मेरे नाम से बाते कहती है. वो ऐसे ही बदनाम हो गयी है. ऊपर से विधवा होने के कारण, मोहल्ले के लोगों की बुरी नज़रें भी उसपर रहती है. वो अब इन सबसे थक गयी थी. इसलिए उसे निश्चय किया कि वो मुझसे शादी करेंगी.ताकि बेटी को एक अच्छा जीवन मिल सके.

पारिजात ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा ‘ तुमने कहा था कि तुम हर वक़्त मेरा साथ दोगे, अब वो मौका आ गया है, कहो क्या कहते हो.‘
मैंने माँ की और देखा. माँ ने हां ने सर हिलाया. मेरी आँखें भीग उठी. मैंने पारिजात से कहा, ‘ हां मैं तुम्हारे साथ हूँ. चलो पहले तुम्हारे घर चलते है और शिव से बात करते है. फिर लालाजी से बात करते है. ‘
मैं, माँ और पारिजात;पारिजात के घर पहुंचे.शिव बाहर ही दिख गया. मैंने उससे कहा कि‘ पारिजात और मैं शादी करना चाहते है ताकि उसे एक नया जीवन मिल सके, जो कि इसकी अधिकारी है. उसकी किस्मत में जो हुआ, उसके लिए उसका जीवन और ख़राब करना और बेटी का जीवन ख़राब करना उचित नहीं है. ‘
शिव मेरी बात को सुनकर शांत रहा. पारिजात ने उसका हाथ पकड़ कर कहा, ‘ भैया अपने घर का सारा हाल तुम्हें पता है, मैं अब यहाँ नहीं रह पाऊंगी. ‘
माँ ने भी शिव को समझाया.शिव मान गया.उसकी पत्नी जो हमारी बाते सुन रहीथी. बाहर आकर कहने लगी,‘ मैंतो पहले ही जानती थी कि ये होगा.’ और भी कुछ अंट – शंट कहने जा रही थी.शिव ने उसकी तरफ गुस्से से देखा और कहा ‘ एक शब्द और कुछ मेरी बहन के लिए कहा तो तुम्हारा वो हाल करूँगा कि तुम याद रखोगी. ये सुनकर वो चुप हो गयी,किसी ने भी शिव को इतने गुस्से में नहीं देखा था.
फिर,हमारे साथ शिव भी आया और हम लालाजी के घर पहुंचे. वहाँ पर हमने माँ को ही बोलने दिया. माँ ने लालाजी को समझाया,कन्हैया की माँ समझदार थी, वो जानती थी कि पारिजात पर अत्याचार हो रहे थे. उसने हामी भर दी. लेकिन लालाजी चुपचाप थे. हम लौट आये.
हम ने ये सोचा कि दो तीन दिन में ही आर्य समाज मंदिर में जाकर शादी कर लेंगे. मैंने और शिव ने सारे इंतजाम किया. मोहल्ले वालो को बुलाया गया. कुछ को ख़ुशी हुई. कुछ आश्चर्य चकित हुए. कुछ क्रोधित हुए. लेकिन हम ने सब कुछ तय कर लिया थाकि पारिजात की ख़ुशी और बेटी की ज़िन्दगी के लिए हमें ये करना ही होगा.
तीन दिन बाद शादी तय हुई. निश्चित समय पर शादी शुरू हुई, वेदमंत्रो के साथ हम दोनों पवित्र बंधन में बंधे. कन्यादान के वक़्त अचानक ही लालाजी और कन्हैया की माँ ने आकर कन्यादान किया. हम सभी में एक ख़ुशी कि लहर दौड़ गयी. बहुत से लोगों की आँखें भीग उठी.

बाद में दूसरे दिन मेरे ही घरपर छोटे से भोज का आयोजन हुआ. तब फिर लालाजी आये और अपनी सारीजायदाद ‘कृष्णवेणी’ के नाम करने के कागजात मुझे सौंप दिए. मेरी आँखें भीग गयी थी. पारिजात भी ख़ुशी से रो पड़ी.

उसी रात को, पारिजात ने अपने और मेरे घर के पारिजात के फूलो से एक हार बनाया जो हमने कन्हैया की फोटो पर लगाया. मुझे बहुत ख़ुशी थी.

मैंने धीरे से पारिजात को कहा,‘अब तुम हमेशा मेरे ही घर महकना.’
वो बहुत दिनों के बाद मुस्करायी और मेरे गले लग गयी .

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