भाग 3 – 1982 —पारिजात के फूल —-विजय कुमार सप्पत्ती, तेलंगाना

हम सब पारिजात के घर में बैठकर लड्डू खा रहे थे. सबसे ज्यादा कन्हैया खा रहा था. पारिजात ने उससे कहा भी कि कल के लिए रहने तो दो, हरी का जन्मदिन मनाएंगे. लेकिन वो कब मानता था. उसनेकहा, मैं कुछ नहीं जानता, बस मुझे खाने दो.

वो मोहल्ले का सबसे प्यारा लड़का था, सभी की मदद करता था. उसके पिता जी को मोहल्ले में लालाजी कहते थे,उनकी किराना की दुकान थी. कन्हैया और पारिजात दोनों ही कायस्थ थे.जबकि मैं जुलाहा था ! लेकिन हम सब के बीच में ये जात-पातकी बाते कभी भी नहीं उठती थी.हम सभी मनुष्यता, प्रेम और दोस्ती से बंधे हुए थे. और उन दिनों मोहल्लों में ये बातेहोती भी थी और नहीं भी होती थी.

पारिजातकि माँ ने पुछा, हरी बेटा, तुम्हारी माँ कह रही थी,किछुटकी के लिए जबलपुर से रिश्ता आया है,‘ मैंने कहा, ‘ हांचाची, लड़का अच्छा है. जबलपुर में MPEB में क्लर्क की जॉब में है. घर परिवार सब ठीक है, खुद का ही घर है, घरमें एक बहन बस है. उनके माता पिता भी सरल स्वभाव के है. मुझेसब कुछ पसंद है, एक बार वो लोग घर आये थे, पारिजात ने भी देखा है.छुटकी और लड़का दोनोंने एक दूसरे को पसंद किया है, बात लगभग तय ही है, बस अगले साल इसकी पढाई होते ही आनंद बाबु के साथ इसका ब्याह रचा दिया जायेगा.

ये सुनते ही छुटकी जो लड्डू खा रही थी, शर्मागयी थी.कन्हैया ने कहा और फिर छुटकी के ब्याह के बाद तुम्हारा और पारिजात का ब्याह. ठीक. मैंने कहा बस मेरी जॉब परमानेंट हो जाए. सब कुछ ठीक ही होंगा.

पारिजात की माँ ने कहा कि मैंने तुम्हारी माँ से कह दिया है कि अगले बरस ही ब्याह हो जाना चाहिए हरी और पारिजात का और अब अब हम नहीं रुकेंगे.हम सब हंस दिए.
मैं अपने फैक्ट्री चल पड़ा. कन्हैया अपने घर.छुटकी और पारिजात दोनों गप्पे मारने लग गए. बस यही छोटा सा जीवन था मोहल्ले का ! और हमारा जीवन, वो तो बस प्रभु जी के हाथो में ही था !

भाग – ४ – 1983

छुटकी की शादी हो गयी. कन्हैया के पिताजी से कर्जा लेना पढ़ा. घर में तो पैसे थे ही नहीं. लालाजी ने बहुत कम ब्याज पर पैसे दिए, उन्हें हमारी दोस्ती के बारे में अच्छे से पता था, नहीं तो कन्हैया जरुर हंगामा करता.खैर अच्छे से शादी हो गयी, मोहल्ले वालो का अच्छा सहयोग था, इन दिनों यही सब बाते तो दिल को लुभाती थी.पंगत में बैठ कर खाना खाने का मज़ा ही कुछ और था. और भी बाते, रीति रिवाज, सब कुछ अच्छे से निपट गया !
छुटकी की विदाई में लगभग सारा मोहल्ला रोया. सब कुछ अच्छे से निपट गया
अब मैं अपनी शादी के सपने देखने लगा, पारिजात के भी कुछ ऐसे ही सपने महक रहे थे.
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.
करीब एक महीने बाद हमारी नौकरी पर गाज गिरी. हमारी फैक्टरी का एक बड़ा आर्डर कैंसिल हो गया.फैक्टरी अनिश्चित काल के लिए बंद हो गयी. जितने भी लोगों की नौकरी गयी.सबके घरों में भुखमरी की नौबत आ गयी. मेरे घर के हालात भी अच्छे नहीं थे. कन्हैया ने कुछ रुपये उधार दिए, लेकिन वो कितने दिन चलते. मैंजोरों से नौकरी ढूंढ रहा था. लेकिन नहीं मिल पा रही थी.

पारिजात से मिलना तो था ही, वो भी मेरी जॉब के लिए परेशान रहती थी.उसकी माँ अलग परेशान कि अब शादी कब होंगी. मैंने कह दिया, बिना नौकरी के मैं शादी नहीं करूँगा.

वहाँ जबलपुर में भी आनंद बाबू कोशिश में थे, लेकिन कहीं पर कोई बात नहीं बन पारही थी. फिर मोहल्लो के लडको ने सोचा कि किसी और शहर में कोशिश की जाए,किसी ने पूनामें कोशिश की, वहाँ बहुत सारे ऑटो पार्ट्स की यूनिट थी, एक फैक्टरी में बात बन गयी, हमारे मोहल्ले और पिछले मोहल्ले की लडको की टोली वहाँ जाने के लिए तैयार हुई.

मेरी माँ बहुत रोई, लेकिन मैंने समझायाकि इसके सिवा कोई चारा नहीं है, जाना ही होगाऔर कोई रास्ता नहीं है.मैंने कहा कि अगर नौकरी पक्की हो जाए तो आकर शादी कर लेता हूँऔर माँ और पारिजात को ले जाता हूँ.

मेरे जाने कि खबर से पारिजात खुश नहीं थी, लेकिन वो समझदार थी.उसने अपने मन को कठोर कर लिया था.रोजहम दोनों मिलते थे. मैं चिंतित था वर्तमान की घटनाओं को लेकर और भविष्य कि अनिश्चितता को लेकर. वो मुझे समझाती थी लेकिन मेरी चिंता मिट नहीं रही थी. लग रहा था कि कुछ ठीक नहीं होने वाला है.

पारिजात रोज मेरे लिए फूल लेकर आती थी. मुझे ही अर्पण करती थी, और कहती थी, तुम ही मेरे सब कुछ हो, सब कुछ ठीक हो जायेगा. मेरी तपस्या व्यर्थ नहीं जायेंगी. वो जब तक मेरे पास रहती थी. सब कुछ अच्छा लगता थालेकिन जैसे ही वो जाती थी, मैं बिखर जाता था.

कन्हैया जब तब कुछ रुपये लाकर मुझे दे जाता था, वो भी खुश नहीं था मेरे जाने कीखबर से, लेकिन उसने कहा कि जब तक यहाँ या आसपास कोई जॉब नहीं मिले, तेरा पूना जाना ही ठीक रहेगा.मैंने उससे कहा था कि वो माँ और पारिजात का खयाल रखेगा.उसने वचन दिया था मुझे!

जाने वाले दिन के पहली शाम को पारिजात मुझे लेकर नदी के किनारे आई, खूब फूटकर रोई. मेरी आँखें भी भीगी थी. लेकिनअब जब फैसला कर ही लिया था तो जाना ही था.पारिजात मेरा हाथ पकड़कर बहुत देर तक बैठी रही. डूबता हुए सूरज को देखती रही, और अपने आंसुओं को पोंछती थी. मैं उसे अपनी कविताओं की डायरी दे दी, और कहा किमेरी अनुपस्थिति में ये डायरी ही उसका सहारा है. उसने डायरी को और मुझे अपने दिल से लगा लिया.

उस रात को वो और कन्हैया मेरे घर पर ही रुके रहे, हम सारी रात जागे, खूब बाते की . माँकी तबीयत ख़राब हो रही थी, मेरे जाने के ख्याल ने उन कीतबीयत पर भीअसर किया था.
दूसरे दिन झेलम एक्सप्रेस से जाना था, जाने के पहले कन्हैया के पिताजी से मिला उनसे कहा कि माँ का ध्यान रखे. उनका पैसा जल्दी ही लौटा दूंगा. फिर पारिजात कीमाँ और शिव से मिला, उन्हें भी माँ का ख़याल रखने को कहा. पारिजात की माँ की असहजता फिर से लौट आयी थी.

शाम को स्टेशन पर माँ,कन्हैया, पारिजात और शिव मुझे छोड़ने आये. मेरे साथ करीब 8 लडको का ग्रुप था जो पूना जा रहा था. हम सब एक ही डब्बे में थे.सबके परिवार वाले छोड़ने आए थे. पहली बार सभी अपने शहर को छोड़कर किसी दूसरे शहर में जा रहे थे.
मेरीआँखें भीगी थी, इन सब को फिर कब देखूंगा इसी ख्याल से, मैंने माँ को अपना ख्याल रखने को कहा और पारिजात और कन्हैया को दिल भर कर देखा. पारिजात बहुत खामोश थी.उसकी आँखों में अजीब सा खालीपन था. शायद सारी रात जगी हुई थी और शायद खूब रोई भी थी. मैंने उससे कहा, मैं जल्दी ही आता हूँ, सब ठीक हो जायेगा
ट्रेनकी सीटी बजी,ट्रेन के चलने का सिग्नल हुआ, ट्रेन धीरे धीरे प्लेटफार्म से खिसकने लगी, हम अपने डब्बे में चढ़ने लगे. मैंने सभी को जी भर कर देखा.पारिजात की अब तक की रुकी हुई रुलाई फूट पड़ी. मेरी भी आँखों से आंसू बहने लगे. मैं डब्बे के भीतर आ गया.

अपनी सीट पर बैठा,पता नहीं कब तक रोता रहा, काफी देर बाद, ग्रुप के लडको ने बैठ कर बाते की, किपूना में कैसे रहेंगे, इत्यादि.मैं पता नहीं किस सोच में भटकते रहा. न खाना खाया गया, न नींद आई, पारिजात का चेहरा रात भर हवा में तैरता रहा.
मन में कुछ अटक सा गया था. लग रहा था कि अब कुछ ठीक न होगा!

भाग –5 – 1983

पूना शहर बहुत खूब सूरत था,विदिशासे बहुत बेहतर था.मुझे तो इसकी सांस्कृतिक आभा खूब अच्छी लगी.खैर टाटा मोटर्स के पास के एक ancilary यूनिट में हमें काम मिला था, हम सब ने वही पर एक दो कमरों का एक घर किरायेपर ले लिए. ज़िन्दगी की नई गाथा शुरू हो गयी थी, हमारे ग्रुप में एक अनिल नाम का लड़का था जो किथोड़ा लीडर टाइप का बंदा था. वही हमारा सुपरवाइजर बना, उसी का कहा सब मानते थे. मुझे वो ज्यादा पसंद नहीं था, लेकिन एक तो वो डिप्लोमा इंजीनियर था, दूसरा उसके काम का अनुभव भी ज्यादा था, और सबसे बड़ी बात उसे आगे बढकर अपनी बात करने आती थी. थोड़ा लड़ाकू भी था. काम के पहले महीने में ही वहां के वर्क्स मैनेजर से उसकी लड़ाई हो गयी.पर्सनल मैनेजर ने आकर हम को समझाया कि, ठीकठाक रहना है, अभी टेम्पररी जॉबहै. नहीं तो निकाल दिए जाओंगे.

अनिल ने हमें कहा कि 6 महीने बीतने दो, फिर मैं इन सबको ठीक करता हु. मुझे आसार कुछ ठीक नहीं लग रहे थे.पर मुझे इस नौकरी की सख्त जरूरत थी.

मैं हर महीने अपनी तनख्वाह का कुछ हिस्सा घर पर भेजदेता था. हर हफ्ते में एक बार रविवार के दिन माँ से,पारिजात सेऔर कन्हैया से बाते कर लेता था. बीचबीच में कभी कभीछुटकी से भीबाते कर लेता था.ज़िन्दगी बस चल रही थी.

पारिजात के फूल यहाँ पूना में भी दिखते थे, तब पारिजात की बहुत याद आती थी. मन मसोस कर रह जाता था. मैं उसे हर दुसरे दिन या तीसरे दिन चिट्ठी लिखता था. लेकिन भेज नहीं पाता था, उन चिट्ठियों को मैं उसे खुद पढ़कर सुनाना चाहता था ताकि वो मेरी भावनाओं को उसी पल में समझे.मैंने उसके लिए बहुत सी कविताएं लिखी,नज्में लिखी, और बहुत सी बाते लिखी, रोजमर्रा की बातें, दिन भर की बातें, बहुत सारी बातें.हमारी शादी की बाते,शादी के बाद के जीवन की बाते, और उस जीवन में रहने वाले हमारे प्रेम की बाते. बस बाते बाते और बाते. सारी चिट्ठियाँ बचा कर रखी.

दीवाली आने वाली थी, हम सब ने घर जाने का प्लान बना लिया था और छुट्टी के लिए अप्लाई भी कर दिया था.छुटकी भी माँ बनने वाली थी, पिछले फ़ोन के दौरान माँ ने मुझे ये खुशखबरी सुनाई थी.मुझे तो सबसे ज्यादा ख़ुशी पारिजातसे मिलने की थी, उसके लिए मैंने एक साड़ी भी खरीद ली थी. आसमानी रंग कीसाड़ी, जिस पर हलके हलकेरंग के फूल बने हुए थे

दीवाली के पहले कंपनी में सभी को बोनस दिया गया, सिर्फ हमारी टीमको छोड़कर, क्योंकि हमारे 6 महीने पूर्णनहीं हुए थे और हम सब टेम्पररी थे. इस बात को लेकर अनिल ने बहुत हंगामा किया, दो दिन काम बंद कर केरखा.वर्क्स मैनेजर और पर्सनल मैनेजर से झगडा किया.पर्सनल मैनेजर ने उसे बरखास्त कर दिया,इसी बात पर अनिल ने पर्सनल मैनेजर के साथ मारपीट कर लिया. मारपीट में बीच बचाव करने आये वर्क्स मैनेजर को और कुछ चोटें आई,पर्सनल मैनेजर की चोट गहरी थी.हमारे पूरे ग्रुप को बरखास्त कर दिया गया और पुलिस में कंप्लेंट कर दी गयी.पुलिस आकर हमें हवालात में ले गयी. हमारा किसी यूनियन के साथ कोई तालमेल भी नहीं था, कोई वकील भी नहीं मिला. हमें6 महीने कीजेल हो गयी.

मेरे सारे सपने चूर चूर हो गए. मैंने माँ को, पारिजात को और कन्हैया को ये बात बताई. कन्हैया कुछ दिन बाद आया, हमारे विदिशा के वकील के साथ. उस वकील ने मुझसे बाते की और प्लांट में बात की, और मुझसे यही बोला कि ये सज़ा तो काटनी ही पड़ेंगी. अपील करके कोई फायदा नहीं. 6 महीने ही तो है. कोई बड़ी बात नहीं.
कन्हैया बहुत दुःखी था, मेरा बचपन का दोस्त था, उसे मालूम था कि मैं बेकसूर हूँ. उसने बताया कि मेरी माँ बहुत परेशान है, पारिजात बिलकुल चुपहो गयी है. कहीं जाती आती नहीं है, सिर्फ मेरी माँ से रोज मिलती है., पारिजात कीमाँ को इस खबर से ही सदमा पहुंचा है कि उनका होने वाला दामाद जेल में है. उनका इलाज चल रहा है. मैंने कहा ‘कन्हैया तू बस कुछ महीने संभाल ले,बाकि मैं जेल से छूटने के बाद तो सब कुछ ठीक कर दूंगा.’ कन्हैया ने कहा ‘तू किसी बात किचिंता न कर, मैंने तेरे घर में जरुरत का सामान ला दिया है, माँ को भी कुछ रुपये दे दिये है. तुम बस खुश रहो.’यही सब कह कर वो चला गया.

मेरा मन बहुत विचलित सा था. ऐसा लग रहा था कि कुछ अशुभ होने वाला है.
मेरी जेल की स्थिति कोबस २ महीने ही गुजरे थे कि कन्हैया और पारिजात मुझसे मिलने आये, साथ में मेरी माँ भी थी. माँ से मिलकर मैं रो पड़ा. माँ भी रो पड़ी. पारिजात भी बिलख उठी. कन्हैया चुपचाप था. थोड़ी देर में माहौल शांत हुआ तो मैंने पुछा ‘कन्हैया क्या बात है तू इतना चुपचाप क्यों है.’

जवाब मेरी माँ ने दिया.‘बेटा हरी, पारिजातकीमाँ को हार्टअटैक हुआ है और वो जल्दी से पारिजात कीशादी देखना चाहती है, उसे लगा रहा है कि अब वो बचेंगी नहीं.डॉक्टर्स ने भी कुछ ऐसा ही इशारा किया है.;

मैंने कहा ‘तो बस ४ महीने और तो है, मैंबस यहाँ से निकलते ही पारिजात से शादी कर लूँगा,जहा इतने दिन रुके हुए थे और ४ महीने बस.’

माँ ने कहा,‘बेटा वो अब तुमसे पारिजात कीशादी नहीं करनी चाहती है. वो नहीं चाहती कि उसका दामाद जेल काट कर आया हो. वो पारिजात की शादी कन्हैया से करने के लिए दबाव डाल रही है. और बार-बार अपनी स्वास्थ्य की धमकी दे रही है कि वो मर जायेंगी.‘
ये सब सुनने के बाद मैं सुन्न सा हो गया, मेरे सारे ख्वाब एक ही पल में ढह गए.
मैंने आवेश में कहा,‘ये क्या बात हुई, इतने बरसो का प्यार, चाची मुझे पहले से ही पसंद नहीं करती थी. बस ये मौका मिल गया, ये अन्याय है.’

मेरी आँखें भीग गयी, मैंने पारिजात से पुछा,‘तुम क्या कहती हो, मना कर दो. ये सब तमाशा है क्या. मेरा प्यार क्या है.’
पारिजात ने मुझे शांत होने के लिए कहा.‘सुनो तुम मेरी जगह होते तो क्या करते. बताओ. माँ की जगह सबसे ऊपर है.’
ये सुनकर मैं एकदम से चुप हो गया.
फिर मैं चिल्लाकर कन्हैया से पुछा,‘तूकैसे तैयार हो गया. तू तो मेरा बचपन का दोस्त है, और तुम्हें सब कुछ पता है. मैं और पारिजात कितना एक दूसरे को प्रेम करते है.’
मुझे पारिजात ने बीच में ही टोका और कहा,‘कन्हैया की कोई गलती नहीं है, इसने कुछ भी नहीं कहा है, मेरी माँ ने सीधे कन्हैया के पिताजी और माँ से बात कीहै.’
मैं शांत था, मेरी आँखों से आंसू बह रहे थे.
जेल का सिपाही बोलने आया कि समय ख़त्म हो गया, लेकिन जेलर ने उसे मना कर दिया और कहा कि उन्हें बाते करने दो. वो मुझे बहुत पसंद करता था. उसे पता था कि मैं बेगुनाह हुं.
पारिजात ने फिर कहा. ‘हमारा प्रेम का घर किसी की बलि पर नहीं निर्माण होगा. माँ जान देने पर तुली हुई है, अगर उसे कुछ हो गया तो हम दोनों एक दूसरे को और अपने आपको कभी भी माफ़ नहीं कर पायेंगे. मेरी जगह तुम रहते तो क्या करते. बोलो.’
मैं क्या बोलता.मैं जैसे मूक हो गया था.मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था
पारिजात ने मेरा हाथ पकड़ कर रोते हुए कहा, ‘बस इस जनममे यही तक साथ था यही समझो.’ और रोते हुए बाहर कीऔर चली गयी’
माँ ने कहा,‘मैं जाती हूँ ; उसे संभालती हु, तुम अपना ख्याल रखना.’
कन्हैया बहुत चुप था. मैंने उसका हाथ थामा और कहा.‘इट्स ओके यार. यही ज़िन्दगी का फैसला है. तो यही सही.उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे. धीरे से उसने कहा,‘यार मुझे माफ़ कर दे.’ और बाहर चला गया.
मैं चुपचाप अपने सेल कीऔर लौट चला. जेलर ने शायद सब कुछ समझ लिया था. उसने मेरा कन्धा थपथपाया, मैंचुप था. एक तूफ़ान सा मन में था. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ या क्या कहूँ. मैं ज़िन्दगी से हार गया था

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