दुनियाँ मेरी भी दुश्मन———- राधा श्रोत्रिय”आशा” -भोपाल

कैसी ये खुमारी है,
अजब सी बेकरारी है…
दूर जाकर भी मुझसे,
दूर नहीं हो पाया तू…
पास आकर भी मेरे,
पास नहीं आ पाया तू …
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इश्क़ की आँच पर ,
हर रात हम दोनों जले ..
ना कहा मैनें कभी,
ना कभी कह पाया तू …

रात साहिल पर बैठकर ,
नगमें वफ़ा के गा रही थी..
दूर फैली वादियों में,
तन्हाई मुस्कुरा रही थी…

मोहब्बत तुझको मुझसे थी,
मोहब्बत मुझको तुझसे थी..
दुनियाँ तेरी भी दुश्मन थी,
दुनियाँ मेरी भी दुश्मन थी…

छुप कर सबकी नजरों से
एक दिन जब हम मिले
ठुकराकर इस दुनियाँ को हम,,,
उस दुनिया के हो लिए

रात भी ठहर सी गयी थी उस पल,,,
इश्क़ के दरिया में जिस पल
दो जिस्म सदा के लिए,,,
एक दूजे के हो लिए.

दूर रेत के टीले पर,
कोई मुसाफिर गा रहा था..
और हमारी मज़ार पर
दीप एक झिलमिला रहा था..

आज फ़िर पूनम की रात है
अपनी रूहों की मुलाकात है
मन्नतों की बाती में,,,
दिए दिलों के जल रहे हैं ..

आंखों ही आंखों में वो—
वादे वफ़ा के कर रहे हैं
तू भी मुस्कुरा रहा है
और मुस्कुरा रही हूँ मैं

वक़्त का मुसाफिर हतप्रभ सा,
ये मंज़र है देख रहा…
छुप कर रात के आँचल में,,,
चाँद भी मुस्कुरा रहा है…

दूर गुजरते काफिलों से
सन्नाटे को चीरती
ऊँटों के गलों से घंटियों की,,,
आवाजें आ रही हैं

भेद मज़हब का भुला कर,,,
दो दिल एक हो गए..
इश्क़ की आँच पर तपकर,,,
और खरे वो हो गए..

इश्क़ का तो एक ही मज़हब,,,
एक ही ख़ुदा है
वक़्त का मुसाफ़िर भी,,,
उसके आगे झुका है

आँखो में ठहरने वाले.. ख्वाब सुन..!
अब भी वक़्त है
भूल जा मुझे..

मेरी आँखे जाग कर
थक चुकी हैं
अब इन्हें अपनी यादों से मुक्त कर,,,
या तू भी उम्र भर के जगराते मोल ले ले..