दस्तक——- राधा श्रोत्रिय”आशा” (भोपाल)

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सुबह-सुबह दस्तक देती
सर्दियों की,
खुशनुमा गुनगुनी धूप,
कितनी सुहानी कितनी
मनभावन होती है!
हवाओं में घुली हल्की-हल्की
गुलाबी सी ठंडक,
बदन में सिहरन सी दौड,
उठती है!
खुद में खुद को सिमटाकर ,
मीठी-मीठी,
नर्म धूप सेकना अद्भुत एहसास है!
जैसे तुमने—
अपनी हथेलियों में, मेरे चेहरे को,
भर लिया हो !
प्रकृति का मधुर संगीत,
हवाओं में गूँजता, प्रतीत होता है !
फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ,
इठला-इठलाकर नृत्य
करती हैं!
एक नन्हीं सी चिरैया
का धूप में नहाना,
एक सुखद सी अनुभूति,
मन को छू जाती है!
भँवरों की गुँजन कानों
में रस घोलती है !
अमरूद के पेडों पर
तोतों की दावत होती है!
सर्दियों की सुबह कितनी
सुहानी कितनी मनभावन
होती है !!!