जिंदगी पीटती गुजर जाती है—- शैलेश कुमार

चाहता हूँ एक सन्नाटा तोड़ना,
लेकिन तोड़ने के बजाय और घना हो जाता है।

खड़ा है , अड़ा है, आरी के तिरछे दांत की तरह
साहिल की जिंदगी काँटों से भर जाता है।

शिकारी के निगाहों से बच जाते साहिल की जिंदगी
फिर अपने विवर में निर्भय बैठ जाता है ।

सुनते है , जिंदगी नावों के पतवारें है ,
लेकिन तड़पती रह जाती माझी और पतवारों के हाथों।

काँटो से बिंधे गुलाब की डंडियाँ
मतलबियों के कारण काँटों से फूल बिछुड़ जाती है।

दो दिलों का मिलन होते , जीवन की रंगीन स्वप्नों को लेकर
लेकिन हर पल मुरझाये फूलों की तरह रह जाते हैं ।

नई उमंगें लेकर आती यह सबेरा
मध्यान्त तक शांत हो जाती है ये जिंदगी।

उषा काल में उस की धुनाई की हलाहल
मध्यांतर में जिंदगी पीटती गुजर जाती है।

विषमय से भरा यह गुबारों की लच्छा
एक पीटती , एक पीटते ,
नि :सहाय देखती रह जाती है जिंदगी।

सुनते हैं, पत्थरों को पीट कर आग जलाई
लेकिन आगोश के आगों में जलती रह जाती ये जिंदगी।