आशा की किरण मात्र यही प्रैक्टिशनर —- शैलेश कुमार

SHAI-IMAGEआवास , शिक्षा, चिकित्सा ,सुरक्षा ,पलायन और शराब ये किसी भी समाज की मौलिक समस्याएं है.

आज तक इन पांच समस्याओं पर सभी सरकारें सफलता पाने में नाकाम रही है।

2012 में मैंने एक सम्पादकीय लेख के माध्यम से देश के सभी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष को यही सन्देश दिया था की अगर इस मूलभूत समस्याओं पर कोई नीति तैयार कर जनता के समक्ष आयें तो बेहतर परिणाम की आशा की जा सकती है।

उस समय मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में चुनाव होने जा रहा था। मध्यप्रदेश सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार के सरकारी ई -मेल पर सीधा सन्देश मैंने भेजा था —अगर मुझे 10 संत दे दी जाय जो देश की राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन होने की संभावना है।

आवास , शिक्षा, चिकित्सा ,सुरक्षा ,पलायन और शराब इस मूल सिंद्धांत पर मैंने अमल करने को कहा था , उसके बाद से जिस किसी भी राज्य में चुनाव हुआ भारतीय जनता पार्टी ने खुले मंच से उक्त विन्दुओं को अपनी आवाजें दी।

लेकिन शराब पर काम सिर्फ बिहार सरकार ने किया ,इसी के कारण बिहार की आधी आवादी ने सरकार को खुल कर समर्थन किया ये अगल बात है की जेडीयू को जितनी सीटे मिलनी चाहिए थी , उतनी नहीं मिली।

कारण था बदलते बिहार को देखने वाले युवा अन्य राज्य में रोजिका के लिए पलायित हैं।

राज्य में रहने वाले जड़बद्ध से क्या आशा की जा सकती है ??

कारण था की जेडीयू ने जातीयता और धर्म के वोट को विकास के वोट में नहीं बदल सका ।

धर्म के नाम पर बिहार के मुस्लिम ने जेडीयू को वोट नहीं किया ?

राजद से गठबंधन भी मतदाताओं के मानसिकता को प्रभावित किया है।

ये सब जेडीयू की अदूरदर्शता का परिणाम है।

बिहार के शराब बंदी के जनसमर्थन से उत्तरप्रदेश हिलने लगा ,यहां के लपोड़ीबाज नेताओं के अनाप -सनाप बयान आने लगे , राजस्थान और उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री बिहार के प्रसंशको की मात्राओं में वृद्धि हुई।

मुझे लगा की एक बार फिर सामाजिक इतिहास बदलने वाला है और शायद दूसरे भारत निर्माता के रूप में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहचाने जायेगे।

चुनाव में हरियाणा सरकार ने भी शराब का जम कर विरोध किया । लेकिन उत्तरप्रदेश और हरियाणा ने राजस्व आमदनी का बहाना बनाया। गरीब और मजदूर के घरों को बर्वाद करनेवाले कीड़ों को यथावत बनाये रखा।

पंजाब चुनाव से एक वर्ष पूर्व ही मैंने हेडिंग में लिखा –अगर पंजाब में आम आदमी पार्टी सही से संचालन करे तो पंजाब फतह हो सकता है क्योंकि बीजेपी सरकार पंजाब में नहीं आ रही है ?

आम आदमी पार्टी ने अपनी मूर्खता का बखूबी परिचय दिया। वह पंजाब में जिस तरह से उतरा , उस रुप में हमें किसी भी कोने से पार्टी की नजरिया नहीं दिख रही थी । फलत: पंजाब नालायक पार्टी के हाथ में चला गया , जो पंजाब के लिए ही नहीं देश के लिए दुर्भाग्य है।

मुझे शराब का समर्थन करने वाले लोग और पार्टी से शक्त नफरत है।

लोकसभा में महाराष्ट्र के सांसद के प्रश्न — वर्तमान में 1000 से अधिक जनसंख्याओं पर एक डाक्टर है इसके लिए आयुष मंत्रालय क्या कर रही है ?

आयुष राज्य मंत्री ने अपने जवाब में कहा की कॉलेजों में 5000 सीटें बढ़ाने के लिए सिफारिश किये है।

लेकिन स्थिति इससे भी भयावह है , शायद सांसदों को पता नहीं है —

वर्तमान में 10,000 आवादियों पर एक चिकित्सक है लेकिन वह भी दिन में मात्र दो घंटों के लिए , रात में तो 40 – 40 किलोमीटर पर अस्पताल जाने के लिए ग्रामीण हतोत्साहित हो जाते हैं ।

मैं उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों से फिर कहना चाहता हूँ की जहाँ से आवागमन के लिए मुख्य मार्ग पर अंदर से 5 -10 किलोमीटर पैदल चलकर आना पड़ता है वैसे दूर -देहात गांवों का सर्वे करे और गांव के युवाओं –युवतियों को प्रथम इलाज करने का प्रशिक्षण देकर छोड़ दें ।

इससे दो फायदें हैं — युवा – युवती को बेरोजगारी महसूस नहीं होगा ।

दूसरा –पीड़ित व्यक्ति को प्रथम इलाज हो सकेगा बाद में वह मुख्य अस्पताल में आसानी से पहुँच सकेगा।

इस तरह जो भी प्रैक्टिस कर अपना परिवार चलाते हैं उन सबको प्रक्षिशण देकर समाज और देश के प्रति उत्तरदायी बनाये।

समय- समय पर सामयिक बीमारियों की पहचान करने हेतु प्रशिक्षण के लिये जिला के मुख्य चिकित्स्ता पदाधिकारियों को ग्रामीण प्रैक्टिशनरों के लिये जागरुकता अभियान का आयोजन करने की आवश्यकता है।

आज भी देश में ग्रामीणों के लिए एक आशा की किरण मात्र यही प्रैक्टिशनर है।

यह भी एक उपाय है।

सभी राज्यों के स्वास्थ्य मंत्री अपने -अपने अधिकार का शक्ति से पालन करवाऐं क्योंकि डाक्टर भी राजनीतिक पार्टी से सम्बन्ध रखते हैं और सरकार को बदनाम करने के लिए कृतघ्न काम करते हैं, गोरखपुर अस्पताल से बेहतर कोई और उदाहरण नहीं हो सकता है।

जो जितने सक्षम और नेतृत्व के पद पर हैं, जिनसे समाज में आमूलचूल परिवर्तन हो सकता है वे उतने ही लफंडर है। इस लफंडरगिरी के कारण समाज दिशाहीन हो चुका है।

जब हम संसद की कार्यवाई देखते रहते हैं तो हमें सांसदों की जानकारी की लघुता पर आश्चर्य होता है।

एक सांसद की आवाजें सिर्फ क्षेत्रीयता से प्रतिबंधित नहीं होता है, वह आवाज समस्त देश की समस्याओं का नेतृत्वकर्ता है। इसलिए लोकसभा में सांसदों द्वारा उठाये गए समस्याओं का निदान ही उस राज्य और उस देश की राजाओं के लिए भविष्य है।

अभी गुजरात सरकार से बहुत बड़ी सीख लेने की जरुरत है —-क्योंकि वहां के विधायक और अधिकारी सत्ता के चमचागिरी में व्यस्त होकर जनता कि अपेक्षाओं को तिरष्कृत किया। जनता भी ठोक कर जवाब दिया है । इसलिये आने वाले चुनावी राज्य अभी से सावधान हो जायें वर्ना पानी-पस्त हो जायेगें।

हम सभी मुख्यमंत्रियों से यही कहना चाहेंगे की वे मंत्रियो और प्रशासकों से जनहित में सेवा लें अगर ये दोनों आपके प्रशंशक बन गए तो सत्ता से जय श्री राम।

सत्ता को बदनाम करने में पार्टी प्रेरित अधिकारी आग में घी डालने का काम करते हैं इसलिये ऐसे अधिकारियों पर गिद्ध दृष्टि रखें और उपयुक्त पहल करें.

हा! ईमानदार अधिकारियों को पुरुष्कृत नही करते हैं तो सतायें भी नही