‘अली अनवर’ शीर्षक पुस्तक पर विचार-गोष्ठी

Ali Anwar PB

‘अली अनवर’

पटना, 8 दिसंबर :(संजीव चौहान)———— पटना पुस्तक मेले में शनिवार (9 दिसंबर) को पूर्व सांसद अली अनवर पर केंद्रित ‘अली अनवर’ शीर्षक पुस्तक पर विचार-गोष्ठी तथा परिचर्चा का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद मुख्य अतिथि होंगे जबकि वक्ताओं में संत समाज समिति के अध्यक्ष प्रमोद कृष्ण, पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी व पुस्तक के प्रकाशक ‘द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन’ के संयोजक संजीव चंदन शामिल रहेंगे।

‘अली अनवर’ शीर्षक इस किताब का संपादन पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता राजीव सुमन ने किया है। यह किताब ‘भारत के राजनेता’ नामक पुस्तक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसके श्रृंखला-संपादक फारवर्ड प्रेस पत्रिका के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन हैं। श्रृंखला संपादक ने बताया कि इस योजना के तहत देश के विभिन्न हिस्सों से चयनित 30 प्रमुख समाज-राजनीति कर्मियों पर किताबें प्रकाशित की जानी हैं। इसमें ऐसे सामाजिक-राजनीतिक नेताओं को जगह दी गई है, जिनका न सिर्फ सामजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान रहा हो, बल्कि जिनकी वैचारिकी मौलिक और भारतीय समाज और राजनीति की गतिकी की दिशा मोड़ने वाली रही हो।

इस श्रृंखला के तहत बिहार से लालू प्रसाद यादव, महाराष्ट्र से आरपीआई के नेता रामदास अठावले, तमिलनाडु से सीपीआई के नेता डी. राजा व सीपीएम के सीताराम येचूरी पर किताबें शीघ्र प्रकाशित होंगी। अन्य पुस्तकों के लिए चयन-प्रक्रिया जारी है।

प्रमोद रंजन ने बताया कि इस योजना के तहत अली अनवर को चुनने का मुख्य आधार भारतीय राजनीति को उनके द्वारा ‘पसमांदा’ शब्द से परिचित करवाना रहा है। यह अकेला शब्द आज भारत की राजनीति में दलित और पिछड़े मुसलमानों की आवाज बुलंद करने का माध्यम बन गया है। उन्होंने पहले बतौर पत्रकार-लेखक इस शब्द के पीछे की अवधारणा को लेकर मुहिम चलाई और बाद में एक सामाजिक संगठन ‘पसमांदा मुस्लिम महाज’ खड़ा किया।

पसमांदा का अर्थ है– वे दलित-पिछड़े मुसलमान, जिनकी सामाजिक-शैक्षणिक स्थित हिंदू दलित-पिछड़ों से कहीं अधिक बुरी रही है, लेकिन उन्हें विभिन्न संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया है। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार पसमांदा मुसलमानों की संख्या कुल मुसलमानों की 70 फीसदी से ज्यादा है।

पसमांदा शब्द और पसमांदा राजनीति ने अली अनवर के नेतृत्व में सबसे पहले बिहार की राजनीति में जगह बनाई, उसके बाद यह आंदोलन विभिन्न राज्यों में फैल गया। आज उत्तर भारतीय राज्यों समेत सुदूर दक्षिण भारत के केरल और तमिलनाडू में भी दलित-पिछड़े मुसलमानों की आवाजें अलग-अलग मंचाें से मुखर होने लगी हैं।

उन्होंने कहा कि अली अनवर ने न सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर काम किया बल्कि उनके लेखन से साहित्य में भी ‘पसमांदा’ विमर्श का रास्ता खुला है, जिसकी आवश्यकता अकादमिक जगत में भी लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

उन्होंने बताया कि “अली अनवर” शीर्षक इस किताब में अली अनवर का एक लंबा साक्षात्कार व उनके भाषणों को संकलित किया गया है, ताकि समाज-राजनीति विज्ञान के अध्येता तथा सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता उनके मूल विचारों को समझ सकें।
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किताब का नाम : ‘अली अनवर’
पुस्तक श्रृंखला : भारत के राजनेता
संपादक : राजीव सुमन
श्रृंखला संपादक : प्रमोद रंजन
प्रकाशन : द मार्जिनलाइज्ड, दिल्ली
पृष्ठ : 128
मूल्य : 200 रूपए (अजिल्द), 400 रूपए (सजिल्द)
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अली अनवर की जीवन यात्रा का संक्षिप्त वर्णन

अली अनवर के पिता डुमरांव के राजा की फैक्ट्री में मजदूरी करते थे।
उनकी मां बीड़ी बनाकर जीविकोपार्जन करती थीं।
अली अनवर ने सार्वजनिक जीवन बतौर पत्रकार शुरू किया।
वे लंबे समय तक वामपंथी समाचार पत्र जनशक्ति से जुड़े रहे। बाद में नवभारत टाइम्स और जनसत्ता से भी जुड़े।

बतौर लेखक उनकी पुस्तक ‘मसावात की जंग’ बहुचर्चित रही।
अली अनवर ने पसमांदा समुदाय के हितों पर तो नियमित फोकस बनाए ही रखा, साथ ही हिंदू दलित-ओबीसी के हितों को लेकर अपनी वचनबद्धता भी कायम रखी। उन्होंने नारा दिया – ‘हिंदू हो या मुसलमान, दलित-पिछड़ा एक समान’

इस किताब में निम्नांकित मामलों की जानकारी पाठकों को मिलती है :

ओबीसी को लेकर उठाये कई सवाल

उन्होंने 14 मार्च 2016 को राज्यसभा में उच्च शिक्षा में ओबीसी की हिस्सेदारी का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि देश के सभी बड़े विश्वविद्यालयों में कोई भी एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर ओबीसी से नहीं है। यह हालत तब है जब भारत में उच्च शिक्षा में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।

जनता के प्रतिनिधि रहे अली अनवर
राज्यसभा में अली अनवर किसी पार्टी विशेष के सदस्य के रूप में नहीं बल्कि आम जनता के प्रतिनिधि रहे। उन्होंने हर वंचित तबके से जुड़े सवालों को सदन में रखा। इनमें पत्रकार से लेकर रिक्शाचालक और रेहड़ी यानी फुटपाथी दुकानदार भी शामिल रहे।

पसमांदा मुसलमानों के सवाल

अली अनवर बिहार में पसमांदा मुसलमानों के राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक सहित सभी पहलुओं पर समग्र वैचारिकी प्रस्तुत करते हैं।

राज्यसभा में उन्होंने कई अवसरों पर इन सवालों को मजबूती से रखा।

14 मार्च 2011 को राज्यसभा में उन्होंने दलित-ईसाई और दलित-मुसलमानों की समस्याओं की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया।

बीड़ी मजदूरों/बुनकरों की समस्याअों को अली अनवर ने कई अवसरों पर मजबूती से रखा और केंद्र सरकार से उन्हें कई प्रकार की सहुलियतें व उनके उद्यम को लघु उद्योग का दर्जा देने की मांग की। साथ ही उन्हें ऋण एवं अनुदान देने की बात भी कही।

11 मार्च 2015 को अली अनवर ने मुस्लिम मल्लाहों की स्थिति पर सदन का ध्यान आकृष्ट किया। उनका कहना था कि दिल्ली, उत्तरप्रदेश और हरियाणा में बड़ी संख्या में मुस्लिम मछली पकड़कर अपना जीवन यापन करते हैं। लेकिन सरकार उन्हें मछुआरा नहीं मानती। इस कारण वे उन लाभों से वंचित हैं जो निषाद समुदाय के लिए सरकार ने निर्धारित कर रखा है।

बिहार से जुड़ी चिंतायें
अपने संसदीय जीवन में अली अनवर ने बिहार के हितों को प्राथमिकता दी। फिर चाहे वह कोसी महाप्रलय के बाद केंद्र सरकार से व्यापक स्तर पर राहत की अपील हो या फिर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का मामला, अली अनवर ने पूरी मजबूती से बिहार का पक्ष रखा।

इस संदर्भ में 20 जुलाई 2009 को अली अनवर द्वारा राज्यसभा में दर्ज कराया गया विरोध उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने भारत सरकार द्वारा पावर प्लांट को बिहार से बंगाल ले जाने के फैसले की आलोचना की थी।

धर्मनिरपेक्षता के प्रति वचनबद्धता

अली अनवर ने धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी वचनबद्धता को कायम रखा। कई अवसरों पर उन्होंने भाजपा के देशतोड़क साजिशों की ओर सदन का ध्यान आकृष्ट किया। संसद में 9 दिसंबर 2009 को उनके द्वारा किया गया एक संबोधन महत्वपूर्ण है जिसमें वे कहते हैं – देश को विध्वंस की ओर ले जाने वाली मंदिर या मस्जिद के नक्शे से और इस जमीन के टुकड़े से यह देश नहीं चलता है। कौमें नहीं चल सकती हैं।

संपर्क : संजीव चौहान
मो०– 8130284314,9968527911