अयोध्या में दिखी त्रेता युग की झलक—- सुरेश हिन्दुस्थानी

भगवान श्रीराम की पावन नगरी श्रीधाम अयोध्या में युगों के बाद फिर से वैसी ही प्रसन्नता का वातावरण बना है, जैसा प्रभु श्रीराम के श्रीलंका पर विजयोपरांत अयोध्या आगमन के समय बना था। जहां तक भारतीय सांस्कृतिक त्यौहारों की बात की जाए तो यह सर्वथा प्रमाणित दिखाई देगा कि भारतीय त्यौहार विश्व के सर्वाधिक प्राचीन पर्वों की श्रेणी में आते हैं। 1

खगोलीय कालगणना के अनुसार होने वाले इन त्यौहारों की वैज्ञानिक प्रामाणिकता भी अब सामने आती जा रही है। भारत के अलावा विश्व का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जिसमें गृह नक्षत्रों के आधार पर त्यौहार मनाए जाते हैं। इसलिए भारत के त्यौहार वास्तव में प्रकृति के आधार पर ही मनाए जाते हैं। कहा जाए है कि जिस त्यौहार में प्रकृति साथ देती है, वही सकारात्मक संदेश प्रवाहित करता है।

वर्तमान में दीपावली के पावन पर्व पर अयोध्या में वायु मार्ग से भगवान राम अयोध्या पधारे। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं भगवान राम की अगवानी की। इस समय पूरा वातावरण राम मय दिखाई दे रहा था और अयोध्या एक बार फिर से सार्थक हो गई। परंपराओं के अनुसार यह शाश्वत सत्य है कि प्रभु श्रीराम के आगमन पर स्वागत दीप जलाकर अंधकार को दूर किया था। आज भी वही प्रकाश पूरे भारत को ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को प्रकाशित करता हुआ दिखाई दे रहा है।

अयोध्या का यह संदेश पूरे देश में समान रुप से प्रवाहित हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ राम राज्य की संकल्पना को साकार रुप में परिणित करने का संकल्पित दिखाई दे रहे हैं। भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में जो राम राज्य था, उसकी परिणति सरयू तट पर प्रतिदिन दिखाई दे रही है, लेकिन दीपावली पर इसका प्रकाश और ज्यादा ही दिखाई दिया।

अयोध्या में ऐसा भी लग रहा है कि इतिहास अपने आपको दोहराने की मुद्रा में आ रहा है। इस बार हालांकि पुष्पक विमान तो नहीं है, लेकिन जिस प्रकार से भगवान श्रीराम पुष्पक से अयोध्या में आए थे, वर्तमान में उसी के अनुरुप वायु मार्ग से हैलीकॉप्टर के माध्यम से श्रीराम का अयोध्या आगमन का वैसा ही दृश्य दिखाई दिया।

अयोध्या में इस प्रकार का दृश्य देखकर हम कल्पना कर सकते हैं कि वह क्षण कितना भावुक रहा होगा, जब यह हुआ होगा। हम जानते हैं कि अयोध्या के कण कण में राम व्याप्त हैं, इसके साथ ही देश में भी राम की मर्यादा एक आदर्श के रुप हमेशा विद्यमान रहेगी। दिवाली की खुशियां भगवान राम के आगमन का ऐसा प्रसंग हैं, जो पूरे देश में दिखाई देतीं हैं। इसलिए पूरे देश में दीपावली के अवसर पर भगवान राम की पूजा करने का भी विधान है।

इस बार भगवान राम की पूजा का विशेष महत्व इसलिए भी ज्यादा है कि अयोध्या ने पूरे देश को फिर से संदेश दिया है। अयोध्या के दीपों ने भी प्रकाश बिखेरा है। यही प्रकाश पूरे देश में व्याप्त अंधकार को मिटाने का कार्य करेगा, अब यह तय दिखाई देने लगा है। वर्तमान में भारत विरोधी साजिश करने वालों ने भगवान राम की जन्म भूमि को विवादित बनाने का काम किया है। भारतीय समाज के लिए यह शर्म की बात ही कही जाएगी कि अयोध्या में भगवान श्रीराम का मंदिर बनाने के लिए समाज को संघर्ष करना पड़ रहा है।

विश्व का ऐसा कोई देश नहीं है, जहां अपने देश के आराध्य के लिए संघर्ष करना पड़ा हो, लेकिन भारत में यही हो रहा है। यह सच है कि कोई भी देश अपने आराध्यों के प्रति श्रद्धा भाव नहीं रखता, वह देश सांस्कृतिक रुप से समाप्त हो जाता है। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि हमारी श्रेष्ठ संस्कृति क्या है। वास्तव में देखा जाए तो संस्कृति का निर्माण कोई दस बीस या सौ दो सौ साल में नहीं होता, इसमें हजारों वर्षों की तपस्या होती है, तब जाकर संस्कृति का निर्माण होता है।

भारत विश्व का अत्यंत प्राचीन देश है। यहां की संस्कृति मुगलों और अंग्रेजों की बनाई संस्कृति नहीं है। मुगलों और अंगे्रजों ने अपनी संस्कृति को भारत पर थोपने का काम किया। हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए मुगलों और अंग्रेजों के आधिपत्य से पूर्व के इतिहास का अध्ययन करना होगा, तभी हमें भारतीय संस्कृति का पता चलेगा। भगवान श्रीराम पुरातन काल से भारतीय संस्कृति का अभिन्न और शाश्वत हिस्सा हैं।

उत्तरप्रदेश सरकार का कदम अयोध्या में दीवाली को सार्थक प्रयास देश को एक दिशा देने की ओर प्रवृत हुआ है। अयोध्या को देखकर ऐसा ही लग रहा है कि देश में फिर से त्रेता युग की झलक का सूत्रपात हुआ है। इस बार अयोध्या में भारत दिखाई दिया। भले ही देश में योगी आदित्यनाथ के इस कार्य की आलोचना हो रही हो, लेकिन उन्हें यह भी जानना चाहिए कि स्वतंत्रता के बाद देश में धर्म निरपेक्षता के नाम पर केवल एक वर्ग को ध्यान में रखकर ही राजनीति की जाती रही है।

भारतीय मानबिन्दुओं की लगातार उपेक्षा की गई। कांग्रेस के शासनकाल में यह ज्यादा ही देखा गया। कांग्रेस वास्तव में फूट डालो और राज करो की नीति का ही अनुसरण करती दिखाई दे रही है। देखा जाए तो भारत की राजनीति केवल वोट प्राप्त करने तक ही सीमित रही है। अगर ऐसा न होता तो अयोध्या में भगवान राम के मंदिर बनाने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।

कल्याण सिंह के शासनकाल में 1991 के बाद पहली बार अयोध्या में भगवान राम को केंद्र में रखकर कोई हलचल है, लेकिन इस बार तस्वीर में आक्रोश, भय या उत्तेजना न होकर लोगों में उस क्षण को जीने की उत्कंठा दिखाई दी। फैजाबाद से अयोध्या की ओर बढ़ते ही स्वागत द्वारों की शृंखला शुरू हो जाती है। पोस्टरों में सिर्फ भगवान राम ही नहीं, रामायण की चौपाइयां भी हैं।

दिगंबर अखाड़े के ब्रह्मलीन मंहत रामचंद्र परमहंस और योगी के गुरु अवैद्यनाथ के घनिष्ठ संबंधों की वजह से अयोध्या से मुख्यमंत्री का भावनात्मक रिश्ता भी है। अयोध्या राजपरिवार से जुड़े प्रख्यात कवि-कलाविद यतींद्र मिश्र इस बार की अयोध्या दीपावली पर अत्यधिक प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं, इसी के साथ अयोध्यावासियों के अंतर्मन भी प्रफुल्लित हैं। अयोध्या में इस प्रकार की दिवाली मनाना एक सांस्कृतिक पहल है। अयोध्या की दीपावली का गौरव इससे वापस आएगा।

इस पूरे कार्यक्रम को चेतना के रुप में देखा जा रहा है। हम यह भी जानते हैं कि अयोध्या की भूमि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना की भूमि है। इसके साथ ही पर्यटन के हिसाब से भी देशवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण स्थल है। प्रदेश सरकार के कारण अयोध्या फिर से चर्चा में हैं। इस बार की चर्चा केवल यही है कि अयोध्या की दीपावली के माध्यम से देश में सकारात्मक संदेश जा रहा है।

*******(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)**********

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